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Rigveda / 3 / 46 / 5

यं सोम॑मिन्द्र पृथि॒वीद्यावा॒ गर्भं॒ न मा॒ता बि॑भृ॒तस्त्वा॒या। तं ते॑ हिन्वन्ति॒ तमु॑ ते मृजन्त्यध्व॒र्यवो॑ वृषभ॒ पात॒वा उ॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 46 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : यम्। सोम॑म्। इ॒न्द्र॒। पृ॒थि॒वीद्यावा॑। गर्भ॑म्। न। मा॒ता। बि॒भृ॒तः। त्वा॒ऽया। तम्। ते॒। हि॒न्व॒न्ति॒। तम्। ऊँ॒ इति॑। ते॒। मृ॒ज॒न्ति॒। अ॒ध्व॒र्यवः॑। वृ॒ष॒भ॒। पात॒वै। ऊँ॒ इति॑॥

पदार्थ : हे (वृषभ) बलिष्ठ (इन्द्र) ऐश्वर्य से युक्त करनेवाले ! जो (त्वाया) आपको प्राप्त हुई (पृथिवीद्यावा) भूमि और बिजुली (माता) माता (गर्भम्) गर्भ को (न) जैसे वैसे (यम्) जिस (सोमम्) ऐश्वर्य को (बिभृतः) धारण करते हैं (तम्) उसको (ते) तुम्हारे लिये जो (हिन्वन्ति) वृद्धि करते हैं (तम्, उ) उसीको (ते) आपके लिये जो (अध्वर्यवः) अपनी हिंसा नहीं चाहते हुए बढ़ाते हैं वा तुम्हारे लिये उसीको जो लोग (मृजन्ति) शुद्ध करते हैं उनकी (उ) ही (पातवै) रक्षा के लिये आप उद्युक्त होइये ॥५॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जो विद्वान् लोग पृथिवी और सूर्य्य के सदृश सबको विद्या और बल से बढ़ाते और उत्तम शिक्षा से पवित्र करते वे माता के सदृश पालन करनेवाले हैं, ऐसा जानकर वे सब लोगों से सत्कार करने योग्य हैं ॥५॥ इस सूक्त में राजा बिजुली और पृथिवी आदिकों के गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह छयालीसवाँ सूक्त और दशवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥