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Rigveda / 3 / 47 / 3

उ॒त ऋ॒तुर्भि॑र्ऋतुपाः पाहि॒ सोम॒मिन्द्र॑ दे॒वेभिः॒ सखि॑भिः सु॒तं नः॑। याँ आभ॑जो म॒रुतो॒ ये त्वान्वह॑न्वृ॒त्रमद॑धु॒स्तुभ्य॒मोजः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 47 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब सूर्य्य के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : उ॒त। ऋ॒तुऽभिः॑। ऋ॒तु॒ऽपाः। पा॒हि॒। सोम॑म्। इन्द्र॑। दे॒वेभिः॑। सखि॑ऽभिः। सु॒तम्। नः॒। यान्। आ। अभ॑जः। म॒रुतः॑। ये। त्वा। अनु॑। अह॑न्। वृ॒त्रम्। अद॑धुः। तुभ्य॑म्। ओजः॑॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुःख के नाशकर्त्ता पुरुष ! आप (ऋतुभिः) वसन्त आदि ऋतुओं के साथ (ऋतुपाः) ऋतुओं की रक्षा करनेवाले सूर्य के सदृश (देवेभिः) विद्वान् (सखिभिः) मित्रों के साथ (सुतम्) उत्पन्न (सोमम्) संसार की (पाहि) रक्षा करो और (यान्) जिन (मरुतः) मरण धर्मवाले मनुष्य (नः) हम लोगों का आप (आ) सब प्रकार (अभजः) सेवन करें (ये) जो लोग (तुभ्यम्) आपके लिये (ओजः) पराक्रम और (वृत्रम्) सब सुखों के कर्त्ता धन को (त्वा) और आपको (अनु, अदधुः) अनुकूलता से धारण करें उनकी आप रक्षा कीजिये (उत) और भी जैसे सूर्य मेघ का (अहन्) नाश करता है, वैसे शत्रुओं का नाश करिये ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजा आदि मनुष्यों ! जैसे सूर्य्य वसन्त आदि ऋतुओं से सम्पूर्ण जगत् की रक्षा करता जलादि रसों का आकर्षण और पुनः वृष्टि करके पालन करता है, वैसे ही विद्वान् मित्रों के साथ विचार करके विजय और पुरुषार्थ से सबकी रक्षा कीजिये ॥३॥