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Rigveda / 3 / 53 / 5

परा॑ याहि मघव॒न्ना च॑ या॒हीन्द्र॑ भ्रातरुभ॒यत्रा॑ ते॒ अर्थ॑म्। यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ रास॑भस्य॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 53 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : परा॑। या॒हि॒। म॒घ॒ऽव॒न्। आ। च॒। या॒हि॒। इन्द्र॑। भ्रा॒तः॒। उ॒भ॒यत्र॑। ते॒। अर्थ॑म्। यत्र॑। रथ॑स्य। बृ॒ह॒तः। नि॒ऽधान॑म्। वि॒ऽमोच॑नम्। वा॒जिनः॑। रास॑भस्य॥

पदार्थ : हे (मघवन्) धनयुक्त और (इन्द्र) सज्जनों के प्रति कोमल और दुष्टों के प्रति उग्र स्वभाववाले ! आप यहाँ से (परा) (याहि) दूर जाइये। हे (भ्रातः) बन्धु जन आप उससे प्राप्त होइये (यत्र) जहाँ (बृहतः) बड़े (रथस्य) सुन्दर वाहन के (रासभस्य) बिजुली आदि के सम्बन्धी के सदृश (वाजिनः) वेगयुक्त के (निधानम्) स्थापन (च) और (विमोचनम्) पृथक् करना होवे (यत्र) जहाँ (उभयत्र) गमन और आगमन में (ते) आपके (अर्थम्) प्रयोजन को हम लोग प्राप्त होवें ॥५॥

भावार्थ : मनुष्यों को चाहिये कि सर्वत्र भ्रमण कार्य्यसिद्धि के लिये करें और नहीं सदा भ्रमण ही करना किन्तु गृह में स्थित हो सम्पूर्ण बन्धुओं के साथ मेल करके फिर भी ऐश्वर्य्य की प्राप्ति के लिये एक देश से दूसरे देश में जावें और आवें ॥५॥