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Rigveda / 3 / 54 / 3

यु॒वोर्ऋ॒तं रो॑दसी स॒त्यम॑स्तु म॒हे षु णः॑ सुवि॒ताय॒ प्र भू॑तम्। इ॒दं दि॒वे नमो॑ अग्ने पृथि॒व्यै स॑प॒र्यामि॒ प्रय॑सा॒ यामि॒ रत्न॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : यु॒वोः। ऋ॒तम्। रो॒द॒सी॒ इति॑। स॒त्यम्। अ॒स्तु॒। म॒हे। सु। नः॒। सु॒ऽवि॒ताय॑। प्र। भू॒त॒म्। इ॒दम्। दि॒वे। नमः॑। अ॒ग्ने॒। पृ॒थि॒व्यै। स॒प॒र्यामि॑। प्रय॑सा। यामि॑। रत्न॑म्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् पुरुष राजन् ! (युवोः) आप दोनों स्वामी सेवक के (रोदसी) अन्तरिक्ष और पृथिवी के सदृश (महे) बड़े (सुविताय) ऐश्वर्य के लिये (इदम्) यह (प्र, भूतम्) अत्यन्त (ऋतम्) प्राप्त होने योग्य कारण (सत्यम्) व्यभिचाररहित अर्थात् नहीं विपरीत होनेवाला (रत्नम्) सुवर्ण और हीरा आदि (नः) हम लोगों का (सु, अस्तु) श्रेष्ठ हो और जैसे मैं (पृथिव्यै) भूमि और (दिवे) प्रकाशमान के लिये (नमः) अन्न आदि का (सपर्यामि) सेवन करता और (प्रयसा) प्रयत्न से विजय को (यामि) प्राप्त होता हूँ, वैसे आप दोनों वर्त्ताव कीजिये ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे भूमि और सूर्य सम्पूर्ण संसार का व्यवहार चलाय के लक्ष्मी और अन्न से युक्त करता है, वैसे ही राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि प्रयत्न से उत्तम कर्मों का सेवन करके अत्यन्त ऐश्वर्य को प्राप्त होवें ॥३॥