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Rigveda / 3 / 54 / 18

अ॒र्य॒मा णो॒ अदि॑तिर्य॒ज्ञिया॒सोऽद॑ब्धानि॒ वरु॑णस्य व्र॒तानि॑। यु॒योत॑ नो अनप॒त्यानि॒ गन्तोः॑ प्र॒जावा॑न्नः पशु॒माँ अ॑स्तु गा॒तुः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 18

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : अ॒र्य॒मा। नः॒। अदि॑तिः। य॒ज्ञिया॑सः। अद॑ब्धानि। वरु॑णस्य। व्र॒तानि॑। यु॒योत॑। नः॒। अ॒न॒प॒त्यानि॑। गन्तोः॑। प्र॒जाऽवा॑न्। नः॒। प॒शु॒ऽमान्। अ॒स्तु॒। गा॒तुः॥

पदार्थ : हे विद्वानो ! (अदितिः) माता के सदृश (अर्य्यमा) न्यायाधीश (यज्ञियासः) जिसमें हिंसा न हो ऐसे यज्ञ के करनेवाले आप लोगो ! (नः) हम लोगों के (वरुणस्य) श्रेष्ठ के (अदब्धानि) हिंसाभिन्न (व्रतानि) सत्य बोलने आदि व्रतों को (युयोत) प्राप्त कराइये (नः) हम लोगों के (गन्तोः) प्राप्त होने योग्य व्यवहार से (अनपत्यानि) नहीं विद्यमान हैं सन्तान जिनमें उनको प्राप्त कराइये जिससे (नः) हम लोगों की (गातुः) पृथिवी (प्रजावान्) सन्तानयुक्त और (पशुमान्) बहुत पशुयुक्त (अस्तु) हो ॥१८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे विद्वानो ! आप लोग हम लोगों को न्यायाधीश और माता के सदृश अन्यायाचरण से अलग करके और सत्य धर्मयुक्त कर्मों को प्राप्त कराके सम्पूर्ण पृथिवी को बहुत प्रजा और असंख्य धनयुक्त करो ॥१८॥