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Rigveda / 3 / 54 / 22

स्वद॑स्व ह॒व्या समिषो॑ दिदीह्यस्म॒द्र्य१॒॑क्सं मि॑मीहि॒ श्रवां॑सि। विश्वाँ॑ अग्ने पृ॒त्सु ताञ्जे॑षि॒ शत्रू॒नहा॒ विश्वा॑ सु॒मना॑ दीदिही नः॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 54 | Mantra No : 22

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : स्वद॑स्व। ह॒व्या। सम्। इषः॑। दि॒दी॒हि॒। अ॒स्म॒द्र्य॑क्। सम्। मि॒मी॒हि॒। श्रवां॑सि। विश्वा॑न्। अ॒ग्ने॒। पृ॒त्ऽसु। तान्। जे॒षि॒। शत्रू॑न्। अहा॑। विश्वा॑। सु॒ऽमनाः॑। दी॒दि॒हि॒। नः॒॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! आप (अस्मद्र्यक्) जो हम लोगों को ज्ञान, गमन, प्राप्ति और सत्कार देता है वह (हव्या) भोजन करने योग्य (श्रवांसि) अन्न वा श्रवणों का (स्वदस्व) भोग करै (इषः) विज्ञानों का (सम्, दिदिहि) प्रकाश करो और अन्न वा श्रवणों को (सम्, मिमीहि) तोलो और सुनो जिससे कि आप (पृत्सु) संग्रामों में (तान्) उनको (विश्वान्) सम्पूर्ण (शत्रून्) शत्रुओं को (जेषि) जीतते हो जिससे (विश्वा) सब (अहा) दिनों को (सुमनाः) प्रसन्नचित्त होते हुए (दीदिहि) प्रकाशित होइये और (नः) हम लोगों को प्रकाशित कीजिये ॥२२॥

भावार्थ : राजा आदि पुरुषों को चाहिये कि बुद्धि के नाश करनेवाले अन्न आदि का त्याग करना कहके विज्ञान बढ़ाय के लोक से वार्ताओं को सुनके सेनाओं की वृद्धि करके और शत्रुओं को जीतकर सब काल में आनन्द और शोक का त्याग करें और धर्म से प्रजाओं का पालन करके विषयों में आसक्ति का त्याग करके आनन्द करना चाहिये ॥२२॥ इस सूक्त में राजा, विद्वान्, प्रजा, अध्यापक, शिष्य, ईश्वर, श्रोता, वक्ता और शूरवीर के कर्म्म और गुण वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये ॥ यह चौवनवाँ सूक्त और सत्ताईसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥