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Rigveda / 3 / 55 / 2

मो षू णो॒ अत्र॑ जुहुरन्त दे॒वा मा पूर्वे॑ अग्ने पि॒तरः॑ पद॒ज्ञाः। पु॒रा॒ण्योः सद्म॑नोः के॒तुर॒न्तर्म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 55 | Mantra No : 2

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा, अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : 0

पदपाठ : मो इति॑। सु। नः॒। अत्र॑। जु॒हु॒र॒न्त॒। दे॒वाः। मा। पूर्वे॑। अ॒ग्ने॒। पि॒तरः॑। प॒द॒ऽज्ञाः। पु॒रा॒ण्योः। सद्म॑नोः। के॒तुः। अ॒न्तः। म॒हत्। दे॒वाना॑म्। अ॒सु॒र॒ऽत्वम्। एक॑म्॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् ! जो (पुराण्योः) अनादि काल से सिद्ध बिजुली और आकाश रूप प्रकृतियों (सद्मनोः) सबके रहने के स्थानों और (देवानाम्) पृथिवी आदि वा जीवों के (अन्तः) मध्य में (केतुः) ज्ञानस्वरूप (महत्) बड़ा (एकम्) अपने सदृश द्वितीय पदार्थ रहित ब्रह्म (असुरत्वम्) प्राणों में क्रीडा करता हुआ है (अत्र) इस ब्रह्म वा विज्ञान के व्यवहार में (नः) हम लोगों को (पदज्ञाः) प्राप्त होने योग्य के जाननेवाले (पूर्वे) प्रथम उत्पन्न हुए (पितरः) विज्ञानवाले (मो) नहीं (जुहुरन्त) प्रसहन करें और (देवाः) विद्वान् लोग इस विज्ञानरूप व्यवहार में हम लोगों को (मा) नहीं (सु) उत्तम प्रकार सहें, इस प्रकार आप भी यह जान के आपको ये लोग न सहें ॥२॥

भावार्थ : वे ही इस संसार में विद्वान् जन पिता के सदृश होवें कि जो प्रकृति आदि पदार्थों में व्याप्त सर्वान्तर्य्यामी ब्रह्म को उत्तम प्रकार जान के अन्यों को जनावें ॥२॥