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Rigveda / 3 / 55 / 21

इ॒मां च॑ नः पृथि॒वीं वि॒श्वधा॑या॒ उप॑ क्षेति हि॒तमि॑त्रो॒ न राजा॑। पु॒रः॒ सदः॑ शर्म॒सदो॒ न वी॒रा म॒हद्दे॒वाना॑मसुर॒त्वमेक॑म्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 55 | Mantra No : 21

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा, इन्द्रः पर्जन्यात्मा त्वष्टा वाग्निश्च | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इ॒माम्। च॒। नः॒। पृ॒थि॒वीम्। वि॒श्वऽधा॑याः। उप॑। क्षे॒ति॒। हि॒तऽमि॑त्रः। न। राजा॑। पु॒रः॒ऽसदः॑। श॒र्म॒ऽसदः॑। न। वी॒राः। म॒हत्। दे॒वाना॑म्। अ॒सु॒र॒ऽत्वम्। एक॑म्॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (नः) हम लोगों के (इमाम्) इस अन्तरिक्ष (च) और (पृथिवीम्) भूमि को समीप (विश्वधायाः) सम्पूर्ण को धारण करनेवाली पृथिवी उसके (हितमित्रः) मित्रों को धारण करनेवाले (राजा) विद्या और विनय से प्रकाशमान अधिपति के (न) सदृश (उप, क्षेति) वसता है और (पुरःसदः) आगे चलने और (शर्मसदः) गृह में ठहरनेवाले (वीराः) क्षात्रधर्म से युक्त शूरों के (न) तुल्य विजय देता है वही (देवानाम्) प्रकाशमान राजा लोगों में (महत्) बड़ा (एकम्) सहायरहित (असुरत्वम्) शत्रुओं को दूर करनेवाला हम लोगों से उपासना करने योग्य है ॥२१॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो धर्मात्मा राजा के सदृश संसार में निवास कराता और धनुर्वेद के जाननेवाले वीर के सदृश विजय दिलाता है, वही ब्रह्म हम लोगों को उपासना करने योग्य है ॥२१॥