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Rigveda / 3 / 56 / 3

त्रि॒पा॒ज॒स्यो वृ॑ष॒भो वि॒श्वरू॑प उ॒त त्र्यु॒धा पु॑रु॒ध प्र॒जावा॑न्। त्र्य॒नी॒कः प॑त्यते॒ माहि॑नावा॒न्त्स रे॑तो॒धा वृ॑ष॒भः शश्व॑तीनाम्॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 56 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा | देवता : विश्वेदेवा: | छन्द : विराट्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : त्रि॒ऽपा॒ज॒स्यः। वृ॒ष॒भः। वि॒श्वऽरू॑पः। उ॒त। त्रि॒ऽउ॒धा। पु॒रु॒ध। प्र॒जाऽवा॑न्। त्रि॒ऽअ॒नी॒कः। प॒त्य॒ते॒। माहि॑नऽवा॒न्। सः। रे॒तः॒ऽधा। वृ॒ष॒भः। शश्व॑तीनाम्॥

पदार्थ : हे (पुरुध) बहुतों को धारण करनेवाले विद्वान् पुरुष जो (त्रिपाजस्यः) तीन शरीर आत्मा और सम्बन्धियों के बलों में निपुण (वृषभः) वृष्टिकर्त्ता (त्र्युधा) जिसमें तीन अर्थात् कारण, सूक्ष्म और स्थूल बढ़े हुए जीव शरीर और (विश्वरूपः) अन्य संपूर्ण रूप जिसमें विद्यमान जो बिजुली के सदृश (उत) और (प्रजावान्) बहुत प्रजाजन (त्र्यनीकः) तथा त्रिगुणित सेनायुक्त के समान (माहिनावान्) बहुत सत्कारवान् है वा (पत्यते) जो स्वामी के सदृश आचरण करता (सः) वह (वृषभः) अत्यन्त बलयुक्त (शश्वतीनाम्) अनादिकाल से हुई प्रकृति और जीवनामक प्रजाओं का (रेतोधाः) जल के सदृश वीर्य को धारण करनेवाले सूर्य के सदृश वीर्य का देनेवाला जगदीश्वर है, ऐसा जानो ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो जगदीश्वर बिजुली के सदृश सब जगह व्यापक होके प्रकाशकर्त्ता धारणकर्त्ता फिर भी न्यायाधीश स्वामी अनन्त महिमा से युक्त और अनादि जीवों का न्यायाधीश वर्त्तमान है, उससे डरके और पापों का त्याग करके प्रीति से धर्म का आचरण कर अपने अन्तःकरण में सब लोग उसी का ध्यान करें ॥३॥