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Rigveda / 3 / 60 / 5

इन्द्र॑ ऋ॒भुभि॒र्वाज॑वद्भिः॒ समु॑क्षितं सु॒तं सोम॒मा वृ॑षस्वा॒ गभ॑स्त्योः। धि॒येषि॒तो म॑घवन्दा॒शुषो॑ गृ॒हे सौ॑धन्व॒नेभिः॑ स॒ह म॑त्स्वा॒ नृभिः॑॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 60 | Mantra No : 5

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : ऋभवः | छन्द : निचृज्जगती | स्वर : निषादः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : इन्द्र॑। ऋ॒भुऽभिः॑। वाज॑वत्ऽभिः। सम्ऽउ॑क्षितम्। सु॒तम्। सोम॑म्। आ। वृ॒ष॒स्व॒। गभ॑स्त्योः। धि॒या। इ॒षि॒तः। म॒घ॒व॒न्। दा॒शुषः॑। गृ॒हे। सौ॒ध॒न्व॒नेभिः॑। स॒ह। म॒त्स्व॒। नृऽभिः॑॥

पदार्थ : हे (मघवन्) प्रंशसितधनयुक्त (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्यवाले ! (धिया) बुद्धि से (इषितः) प्रेरित आप (वाजवद्भिः) प्रशंसनीय अन्न आदि ऐश्वर्यों से युक्त (ऋभुभिः) बुद्धिमानों के साथ (समुक्षितम्) उत्तम प्रकार सींचे (सुतम्) उत्पन्न किये गये (सोमम्) ऐश्वर्य को (गभस्त्योः) हाथों के बल से (आ, वृषस्व) सब प्रकार पुष्टिये, (सौधन्वनेभिः) बुद्धिमानों के पुत्रों और (नृभिः) विद्या आदि व्यवहारों में अग्रगन्ता जनों के (सह) साथ (दाशुषः) देनेवाले के (गृहे) घर में (मत्स्व) आनन्दित हूजिये ॥५॥

भावार्थ : राजा को चाहिये कि बुद्धिमान् जनों के सहित प्रजाओं की रक्षा और न्याय से ऐश्वर्य की वृद्धि करके तथा राज्य के कर देनेवालों को आनन्दित करके नायकों के साथ प्रजाओं को सदैव आनन्दित करैं ॥५॥