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Rigveda / 3 / 61 / 3

उषः॑ प्रती॒ची भुव॑नानि॒ विश्वो॒र्ध्वा ति॑ष्ठस्य॒मृत॑स्य के॒तुः। स॒मा॒नमर्थं॑ चरणी॒यमा॑ना च॒क्रमि॑व नव्य॒स्या व॑वृत्स्व॥

Veda : Rigveda | Mandal : 3 | Sukta : 61 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : गोपवन आत्रेयः सप्तवध्रिर्वा | देवता : उषाः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं।

पदपाठ : उषः॑। प्र॒ती॒ची। भुव॑नानि। विश्वा॑। ऊ॒र्ध्वा। ति॒ष्ठ॒सि॒। अ॒मृत॑स्य। के॒तुः। स॒मा॒नम्। अर्थ॑म्। च॒र॒णी॒यमा॑ना। च॒क्रम्ऽइ॑व। न॒व्य॒सि॒। आ। व॒वृ॒त्स्व॒॥

पदार्थ : हे स्त्रि ! जैसे (विश्वा) सम्पूर्ण (भुवनानि) उत्पन्न हुए लोकों को (प्रतीची) प्राप्त होने और (अमृतस्य) अमृतस्वरूप रस की (केतुः) जनानेवाली (ऊर्ध्वा) ऊपर को वर्त्तमान (चक्रमिव) पहिये के सदृश चलनेवाले (समानम्) तुल्य (अर्थम्) वस्तु को (चरणीयमाना) प्राप्त होती हुई (नव्यसि) अत्यन्त नवीन (उषः) प्रातःकाल की वेला वर्त्तमान और (तिष्ठसि) स्थिर होती है, वैसे ही आप (आ, ववृत्स्व) वर्त्ताव करिये ॥३॥

भावार्थ : हे उत्तम स्त्रियो ! जैसे प्रातःकाल सम्पूर्ण भुवनों के खण्डों को प्रकाशित करते हैं, वैसे ही उत्तम व्यवहारों को प्रकाशित करो ॥३॥