Rigveda / 4 / 1 / 6
अ॒स्य श्रेष्ठा॑ सु॒भग॑स्य सं॒दृग्दे॒वस्य॑ चि॒त्रत॑मा॒ मर्त्ये॑षु। शुचि॑ घृ॒तं न त॒प्तमघ्न्या॑याः स्पा॒र्हा दे॒वस्य॑ मं॒हने॑व धे॒नोः ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 1 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : agniH | Metre : bhurikpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asya shreShThaa subhagasya sa.mdRRigdevasya chitratamaa martyeShu. shuchi ghRRita.m na taptamaghnyaayaaH spaarhaa devasya ma.mhaneva dhenoH .6.
Component Words : asya. shreShThaa. su.abhagasya. sam.adRRik. devasya. chitra.atamaa. martyeShu. shuchi. ghRRitam. na. taptam. aghnyaayaaH. spaarhaa. devasya. ma.mhanaa.aiva. dhenoH.6.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अ॒स्य। श्रेष्ठा॑। सु॒ऽभग॑स्य। स॒म्ऽदृक्। दे॒वस्य॑। चि॒त्रऽत॑मा। मर्त्ये॑षु। शुचि॑। घृ॒तम्। न। त॒प्तम्। अघ्न्या॑याः। स्पा॒र्हा। दे॒वस्य॑। मं॒हना॑ऽइव। धे॒नोः॥६॥
पदार्थ : हे विद्वन् ! (मर्त्येषु) मनुष्यों में (अस्य) इस सब के पालन करनेवाले (सुभगस्य) प्रशंसित ऐश्वर्य्य और (देवस्य) दिव्य गुण कर्म और स्वभावयुक्त राजा के (चित्रतमा) अत्यन्त अद्भुत और (श्रेष्ठा) उत्तम कर्म (तप्तम्) तपाये गये (शुचि) पवित्र (घृतम्) घी के (न) समान वर्त्तमान हैं तथा (अघ्न्यायाः) न नष्ट करने योग्य (धेनोः) वाणी के वा गौ के तपाये गये पवित्र घी के सदृश (देवस्य) परमात्मा के (स्पार्हा) चाहने योग्य (मंहनेव) अतीव पूजनीय सदृश कर्म वर्त्तमान हैं, उनके (संदृक्) उत्तम प्रकार देखनेवाले होते हुए राज्य की वृद्धि करो ॥६॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। जिन राजादिकों के अग्नि से तपाये गये स्वच्छ घृत के समान विद्वान् की उत्तम शिक्षित वाणी के मधुर वचनों के समान वचन और परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभावों के समान गुण, कर्म, स्वभाव हैं, वे अति आश्चर्य्यरूप ऐश्वर्य्य राज्य और अद्भुत कीर्ति को प्राप्त होते हैं ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : अ॒स्य। श्रेष्ठा॑। सु॒ऽभग॑स्य। स॒म्ऽदृक्। दे॒वस्य॑। चि॒त्रऽत॑मा। मर्त्ये॑षु। शुचि॑। घृ॒तम्। न। त॒प्तम्। अघ्न्या॑याः। स्पा॒र्हा। दे॒वस्य॑। मं॒हना॑ऽइव। धे॒नोः॥६॥
पदार्थ : (अस्य) सर्वपालकस्य राज्ञः (श्रेष्ठा) श्रेष्ठानि कर्माणि (सुभगस्य) प्रशंसितैश्वर्य्यस्य (संदृक्) यः सम्यक् पश्यति (देवस्य) दिव्यगुणकर्मस्वभावस्य (चित्रतमा) अतिशयाद्भुतगुणकर्मस्वभावोत्पादकानि (मर्त्येषु) मनुष्येषु (शुचि) पवित्रम् (घृतम्) आज्यम् (न) इव (तप्तम्) (अघ्न्यायाः) हन्तुमयोग्यायाः (स्पार्हा) स्पर्हणीयानि (देवस्य) परमात्मनः (मंहनेव) महान्ति पूजनीयानीव (धेनोः) वाण्या गोर्वा ॥६॥
अन्वय : हे विद्वन् ! मर्त्त्येष्वस्य सुभगस्य देवस्य चित्रतमा श्रेष्ठा तप्तं शुचि घृतं न वर्त्तन्तेऽघ्न्याया धेनोस्तप्तं शुचि घृतं न देवस्य स्पार्हा मंहनेव वर्त्तन्ते तेषां संदृक् सन् राज्यं वर्द्धय ॥६॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । येषां राजादीनामग्निना तप्तं शुद्धघृतमिव विदुषः सुशिक्षिताया वाचो मधुराणि भाषणानीव भाषणानि परमेश्वरस्य गुणकर्मस्वभावा इव गुणकर्मस्वभावास्सन्ति तेऽत्याश्चर्य्यमैश्वर्यं राज्यमद्भुतां कीर्तिं च लभन्ते ॥६॥