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Rigveda / 4 / 1 / 8

स दू॒तो विश्वेद॒भि व॑ष्टि॒ सद्मा॒ होता॒ हिर॑ण्यरथो॒ रंसु॑जिह्वः। रो॒हिद॑श्वो वपु॒ष्यो॑ वि॒भावा॒ सदा॑ र॒ण्वः पि॑तु॒मती॑व सं॒सत् ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 1 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सः। दू॒तः। विश्वा॑। इत्। अ॒भि। व॒ष्टि॒। सद्म॑। होता॑। हिर॑ण्यऽरथः। रम्ऽसु॑जिह्वः। रो॒हित्ऽअ॑श्वः। व॒पु॒ष्यः॑। वि॒भाऽवा॑। सदा॑। र॒ण्वः। पि॒तु॒मती॑ऽइव। स॒म्ऽसत्॥८॥

पदार्थ : (हिरण्यरथः) तेजोमय सुन्दर स्वरूपयुक्त सूर्य्य के सदृश जिसका व्यवहार (रंसुजिह्वः) सुन्दर जिसकी वाणी (रोहिदश्वः) जिसके रक्त आदि गुणों से विशिष्ट अग्नि आदिक घोड़े शीघ्र चलनेवाले वह (वपुष्यः) रूपों में प्रसिद्ध (विभावा) ऐश्वर्य्यवान् (रण्वः) सुन्दर स्वरूपयुक्त (होता) देने वा लेनेवाला होता हुआ राजा (दूतः) दुष्टों को सन्ताप देते हुए के सदृश (विश्वा) सब (सद्म) उत्तम कर्म वा स्थानों की (अभि, वष्टि) कामना करता है (सः) वह (इत्) ही (संसत्) चक्रवर्तियों की सभा (पितुमतीव) जो कि प्रशंसित बहुत अन्न आदि ऐश्वर्य्य से युक्त उसके सदृश (सदा) सब काल में उन्नतिशील होता है ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमा अलङ्कार हैं। जैसे दूतजन राजाओं के हित करने की इच्छा करते हैं, वैसे ही जो राजाजन प्रजा का हित निरन्तर करते हैं, वे राजा और सभासद् पुण्य के भजनेवाले होते हैं ॥८॥