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Rigveda / 4 / 2 / 14

अधा॑ ह॒ यद्व॒यम॑ग्ने त्वा॒या प॒ड्भिर्हस्ते॑भिश्चकृ॒मा त॒नूभिः॑। रथं॒ न क्रन्तो॒ अप॑सा भु॒रिजो॑र्ऋ॒तं ये॑मुः सु॒ध्य॑ आशुषा॒णाः ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 2 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब प्रजाजन के कृत्य को कहते हैं ॥

पदपाठ : अध॑। ह॒। यत्। व॒यम्। अ॒ग्ने॒। त्वा॒ऽया। प॒ड्ऽभिः। हस्ते॑भिः। च॒कृ॒म। त॒नूभिः॑। रथ॑म्। न। क्रन्तः॑। अप॑सा। भु॒रिजोः॑। ऋ॒तम्। ये॒मुः॒। सु॒ऽध्यः॑। आ॒शु॒षाणाः॥१४॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान राजन् ! (त्वाया) आपको प्राप्त (सुध्यः) उत्तम बुद्धिवाले (आशुषाणाः) शीघ्र विभाग करनेवाले (वयम्) हम लोग (हस्तेभिः) हाथों (पड्भिः) पैरों और (तनूभिः) शरीरों से (यत्) जिस (रथम्) विमान आदि वाहन के (न) सदृश (चकृम) करें (अध) इसके अनन्तर (ह) निश्चय जो (अपसा) कर्म से (भुरिजोः) धारण और पोषण करनेवालों के (ऋतम्) सत्य को (येमुः) प्राप्त होवें उस विमान आदि वाहन के सदृश (क्रन्तः) क्रम से चलनेवाले हूजिये ॥१४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि आलस्य त्याग के शरीरादिकों से पुरुषार्थ को सदा ही करके प्रजा और राज्य का धर्म से नियम करें, जिससे सब लोग धनयुक्त होवें ॥१४॥