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Rigveda / 4 / 4 / 3

प्रति॒ स्पशो॒ वि सृ॑ज॒ तूर्णि॑तमो॒ भवा॑ पा॒युर्वि॒शो अ॒स्या अद॑ब्धः। यो नो॑ दू॒रे अ॒घशं॑सो॒ यो अन्त्यग्ने॒ माकि॑ष्टे॒ व्यथि॒रा द॑धर्षीत् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर राज विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : प्रति॑। स्पशः॑। वि। सृज॒। तूर्णि॑ऽतमः। भव॑। पा॒युः। वि॒शः। अ॒स्याः। अद॑ब्धः। यः। नः॒। दू॒रे। अ॒घऽशं॑सः। यः। अन्ति॑। अग्ने॑। माकिः॑ ते॒। व्यथिः॑। आ। द॒ध॒र्षी॒त्॥३॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वन् राजन् ! आप (तूर्णितमः) अत्यन्त शीघ्रकारी होते हुए (स्पशः) अत्यन्त स्पर्श करने अर्थात् मुँह लगनेवालों का (वि, सृज) त्याग करो, और (अस्याः) इस (विशः) प्रजा के (अदब्धः) नहीं मारने और (पायुः) पालन करनेवाले (प्रति, भव) होओ (यः) जो (अघशंसः) पाप की प्रशंसा करनेवाला चोर (नः) हम लोगों के (दूरे) दूर देश में वा (यः) जो (अन्ति) समीप में वर्त्तमान हो वह (ते) आपको (व्यथिः) पीड़ारूप (माकिः) मत (आ, दधर्षीत्) ढीठ हो ॥३॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप उत्तम गुणों को ग्रहण करके और प्रजा का पालन करके जो दूर और समीप में वर्त्तमान डाकू आदि दुष्ट पुरुष उनका नाश करो, जिससे सब को सुख हो ॥३॥