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Rigveda / 4 / 4 / 9

इ॒ह त्वा॒ भूर्या च॑रे॒दुप॒ त्मन्दोषा॑वस्तर्दीदि॒वांस॒मनु॒ द्यून्। क्रीळ॑न्तस्त्वा सु॒मन॑सः सपेमा॒भि द्यु॒म्ना त॑स्थि॒वांसो॒ जना॑नाम् ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इ॒ह। त्वा॒। भूरि॑। आ। च॒रे॒त्। उप॑। त्मन्। दोषा॑ऽवस्तः। दी॒दि॒ऽवांस॑म्। अनु॑। द्यून्। क्रीळ॑न्तः। त्वा॒। सु॒ऽमन॑सः। स॒पे॒म॒। अ॒भि। द्यु॒म्ना। त॒स्थि॒वांसः॑। जना॑नाम्॥९॥

पदार्थ : हे राजन् ! (इह) इस राजकर्म में आप (त्मन्) आत्मा में (भूरि) बहुत शुभकर्म (उप, आ, चरेत्) करें (सुमनसः) श्रेष्ठ मनयुक्त जन (तस्थिवांसः) स्थिर और (अनु, द्यून्,) प्रतिदिन (क्रीळन्तः) धनुर्वेदविद्या की शिक्षा के लिये और युद्ध के लिये शस्त्रों का अभ्यास करते हुए हम लोग (जनानाम्) राजा और प्रजा के पुरुषों के मध्य में (दीदिवांसम्) प्रकाशमान वा प्रकाश करते हुए और (द्युम्ना) यश वा धन के सहित वर्त्तमान राजमान (त्वा) आपकी (दोषावस्तः) दिन-रात्रि प्रशंसा करें, जो अश्रेष्ठ कर्म्म करो तो (त्वा) आपकी (अभि, सपेम) निन्दा करें ॥९॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आप दुर्व्यसनों का त्याग करके धर्म्मसम्बन्धी कर्म्मों को करें तो हम लोग आपके भक्त निरन्तर होवें, जो अन्याय करो तो आप का शीघ्र त्याग करें ॥९॥