Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 4 / 15

अ॒या ते॑ अग्ने स॒मिधा॑ विधेम॒ प्रति॒ स्तोमं॑ श॒स्यमा॑नं गृभाय। दहा॒शसो॑ र॒क्षसः॑ पा॒ह्य१॒॑स्मान्द्रु॒हो नि॒दो मि॑त्रमहो अव॒द्यात् ॥१५॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 4 | Mantra No : 15

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : रक्षोहाऽग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒या। ते॒। अ॒ग्ने॒। स॒म्ऽइधा॑। वि॒धे॒म॒। प्रति॑। स्तोम॑म्। श॒स्यमा॑नम्। गृ॒भा॒य॒। दह॑। अ॒शसः॑। र॒क्षसः॑। पा॒हि। अ॒स्मान्। द्रु॒हः। नि॒दः। मि॒त्र॒ऽम॒हः॒। अ॒व॒द्यात्॥१५॥

पदार्थ : हे (अग्ने) राजन् ! हम लोग (ते) आपकी (अया) इस प्राप्त हुई (समिधा) उत्तम प्रकार प्रदीप्त नीति के साथ जिस (शस्यमानम्) प्रशंसा करने योग्य प्रशंसित होते हुए को (स्तोमम्) प्रशंसनीय (विधेम) करें उसको आप (प्रति, गृभाय) ग्रहण कीजिये (अशसः) निन्दक (रक्षसः) दुष्टाचरणों को (दह) भस्म कीजिये और (द्रुहः) द्रोह से युक्त (निदः) निन्दा करनेवाले का (अवद्यात्) अधर्माचरण से (मित्रमहः) मित्रों का सत्कार करनेवाले (अस्मान्) हम लोगों का (पाहि) पालन कीजिये ॥१५॥

भावार्थ : जो राजा और मन्त्री जन परस्पर सम्मत हुए नम्रता से राज्य की शिक्षा करते हैं तो द्वेष निन्दा और अधर्माचरण से अलग होकर उत्तम शिष्टाचार करते हुए दशों दिशाओं में यश को फैलाते हैं ॥१५॥ इस सूक्त में राजा और प्रजा के कृत्य वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१५॥ यह चतुर्थ मण्डल में चतुर्थ सूक्त और तीसरे अष्टक में पच्चीसवाँ वर्ग और चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥