Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 5 / 7

तमिन्न्वे॒३॒॑व स॑म॒ना स॑मा॒नम॒भि क्रत्वा॑ पुन॒ती धी॒तिर॑श्याः। स॒सस्य॒ चर्म॒न्नधि॒ चारु॒ पृश्ने॒रग्रे॑ रु॒प आरु॑पितं॒ जबा॑रु ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 5 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विवाहपरता से उपदेशविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तम्। इत्। नु। ए॒व। स॒म॒ना। स॒मा॒नम्। अ॒भि। क्रत्वा॑। पु॒न॒ती। धी॒तिः। अ॒श्याः॒। स॒सस्य॑। चर्म॑न्। अधि॑। चारु॑। पृश्नेः॑। अग्रे॑। रु॒पः। आरु॑पितम्। जबा॑रु॥७॥

पदार्थ : हे कन्ये ! जिस (ससस्य) शयन करते हुए के (चर्मन्) चमड़े में (चारु) सुन्दर (जबारु) वेग करता हुआ वा आरूढ़ (आरुपितम्) आरोपण किया गया वा जो (पृश्नेः) अन्तरिक्ष के (अभि) सब ओर है उसके (अग्रे) आगे (अधि, रुपः) अधिरोपण करनेवाले की (क्रत्वा) उत्तम बुद्धि से (पुनती) पिता के सम्बन्ध से पवित्र करती हुई (धीतिः) उत्तम गुणों के धारण करनेवाली (समना) तुल्य हुई (तम्) (इत्) उसी (समानम्) समान पति को (नु, एव) शीघ्र ही (अश्याः) प्राप्त हो ॥७॥

भावार्थ : जो कन्या अपने समान वर और ब्रह्मचारी अपने तुल्य कन्या के साथ विवाह करे तो अन्तरिक्ष के मध्य में ईश्वर से स्थापित सूर्य्य चन्द्रमा और नक्षत्रों के तुल्य शोभित होते हैं ॥७॥