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Rigveda / 4 / 5 / 14

अ॒नि॒रेण॒ वच॑सा फ॒ल्ग्वे॑न प्र॒तीत्ये॑न कृ॒धुना॑तृ॒पासः॑। अधा॒ ते अ॑ग्ने॒ किमि॒हा व॑दन्त्यनायु॒धास॒ आस॑ता सचन्ताम् ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 5 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : वैश्वानरः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब समाधाता के विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒नि॒रेण। वच॑सा। फ॒ल्ग्वे॑न। प्र॒तीत्ये॑न। कृ॒धुना॑। अ॒तृ॒पासः॑। अध॑। ते। अ॒ग्ने॒। किम्। इ॒ह। व॒द॒न्ति। अ॒ना॒युधासः॑। अस॑ता। स॒च॒न्ता॒म्॥१४॥

पदार्थ : हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष ! जो (अनिरेण) नहीं रमने योग्य (प्रतीत्येन) प्रतीति में प्रसिद्ध हुए (फल्ग्वेन) बड़े (कृधुना) छोटे (वचसा) वचन से (अतृपासः) अतृप्त होते हुए (आसता) नहीं वर्त्तमान बल आदि से (अनायुधासः) विना शस्त्र-अस्त्रवालों के सदृश (इह) इस संसार वा इस जन्म में (किम्) क्या (वदन्ति) कहते हैं (अध) इसके अनन्तर (ते) आपके लिये किसे (सचन्ताम्) प्राप्त होवें, इसका उत्तर कहिये ॥१४॥

भावार्थ : जो श्रोता लोग उपदेश से उत्तर को प्राप्त हुए सन्तुष्ट न होवें, वे तब तक पूछें, जब कि समाधान को प्राप्त होवें, तब उस कर्म का आरम्भ करें ॥१४॥