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Rigveda / 4 / 6 / 10

ये ह॒ त्ये ते॒ सह॑माना अ॒यास॑स्त्वे॒षासो॑ अग्ने अ॒र्चय॒श्चर॑न्ति। श्ये॒नासो॒ न दु॑वस॒नासो॒ अर्थं॑ तुविष्व॒णसो॒ मारु॑तं॒ न शर्धः॑ ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 6 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : ये। ह॒। त्ये। ते॒। सह॑मानाः। अ॒यासः॑। त्वे॒षासः॑। अ॒ग्ने॒। अ॒र्चयः॑। चर॑न्ति। श्ये॒नासः॑। न। दु॒व॒स॒नासः॑। अर्थ॑म्। तु॒वि॒ऽस्व॒नसः॑। मारु॑तम्। न। शर्धः॑॥१०॥

पदार्थ : हे (अग्ने) अग्नि के सदृश वर्त्तमान ! (ये) जो लोग (ते) आपके (सहमानाः) सुख दुःख आदि व्यवहारों के सहनेवाले (अयासः) विज्ञान को प्राप्त (त्वेषासः) प्रकाशमान (श्येनासः) और बाजपक्षी के सदृश शीघ्र चलनेवाले घोड़ों के (न) सदृश (दुवसनासः) ले चलने और (तुविष्वणसः) बलों के माँगनेवाले (मारुतम्) पवनसम्बन्धी (शर्धः) बल को (न) जैसे (अर्चयः) उत्तम क्रिया वैसे (अर्थम्) द्रव्य को (चरन्ति) प्राप्त होते हैं (त्ये) वे (ह) ही अन्य जन आपको सत्कार करने योग्य होते हैं ॥१०॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो लोग क्षमा से युक्त, धर्म्मसम्बन्धी कर्म्म के आचरण से प्रकाशमान, उत्तम यशवाले, घोड़े के सदृश कार्य्यकर्ता और बलवान् हों, वे सत्कार करने योग्य होवें ॥१०॥