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Rigveda / 4 / 7 / 7

स॒सस्य॒ यद्वियु॑ता॒ सस्मि॒न्नूध॑न्नृ॒तस्य॒ धाम॑न्र॒णय॑न्त दे॒वाः। म॒हाँ अ॒ग्निर्नम॑सा रा॒तह॑व्यो॒ वेर॑ध्व॒राय॒ सद॒मिदृ॒तावा॑ ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 7 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर अग्निविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒सस्य॑। यत्। विऽयु॑ता। सस्मि॑न्। ऊध॑न्। ऋ॒तस्य॑। धाम॑न्। र॒णय॑न्त। दे॒वाः। म॒हान्। अ॒ग्निः। नम॑सा। रा॒तऽह॑व्यः। वेः। अ॒ध्व॒राय॑। सद॑म्। इत्। ऋ॒तऽवा॑॥७॥

पदार्थ : जो (देवाः) विद्वान् लोग (नमसा) पृथिवी आदि अन्न के साथ वर्त्तमान (रातहव्यः) जिसने ग्रहण करने योग्य पदार्थ दिया (ऋतावा) जो जल का विभाग करनेवाला (महान्) महान् (अग्निः) बिजुली रूप अग्नि (वेः) पक्षी के सदृश (सदम्) प्राप्त होने योग्य स्थान को प्राप्त कराता है (यत्) जिस अग्नि में (सस्मिन्) सब (ऊधन्) अवयव में और (ऋतस्य) सत्य के (धामन्) स्थान में (ससस्य) स्वप्नसम्बन्ध से (वियुता) वियुक्त अर्थात् विना स्वप्न वस्तुएँ (रणयन्त) शब्द करती हैं, उसको (अध्वराय) अहिंसनीय व्यवहार के लिये (इत्) जानते ही हैं, वे सत्य के जाननेवाले होते हैं ॥७॥

भावार्थ : हे बुद्धिमान् पुरुषो ! जो अग्नि शरीर आदि में और निद्रा में प्रसिद्ध होता है, वह बड़ा होने से सर्वत्र व्यापक है ॥७॥