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Rigveda / 4 / 9 / 6

वेषीद्व॑स्य दू॒त्यं१॒॑ यस्य॒ जुजो॑षो अध्व॒रम्। ह॒व्यं मर्त॑स्य॒ वोळ्ह॑वे ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 9 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : विराड्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : वेषि॑। इत्। ऊ॒म् इति॑। अ॒स्य॒। दू॒त्यम्। यस्य॑। जुजो॑षः। अ॒ध्व॒रम्। ह॒व्यम्। मर्त॑स्य। वोळ्ह॑वे॥६॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जो आप (यस्य) जिस (मर्तस्य) मनुष्य के (दूत्यम्) दूतसम्बन्धी कर्म्म को (वेषि) प्राप्त होते हो और जिसके (वोळ्हवे) प्राप्त होने के लिये (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य (अध्वरम्) हिंसारहित व्यवहार का (उ) ही (जुजोषः) सेवन करो (इत्) वही आप (अस्य) इसके दूत होने के योग्य हैं ॥६॥

भावार्थ : हे राजा लोगो ! जो पूर्ण विद्यायुक्त बहुत बोलनेवाले स्नेही और धार्मिक जन हैं और जो लोग राज्य के व्यवहार को धारण कर सकते हैं, उन शूरवीर मित्रों को समाचारप्रापक बना और राज्य के समाचारों को जान के विशेष प्रबन्ध करो ॥६॥