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Rigveda / 4 / 10 / 4

आ॒भिष्टे॑ अ॒द्य गी॒र्भिर्गृ॒णन्तोऽग्ने॒ दाशे॑म। प्र ते॑ दि॒वो न स्त॑नयन्ति॒ शुष्माः॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 10 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिग्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब अमात्यविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : आ॒भिः। ते॒। अ॒द्य। गीः॒ऽभिः। गृ॒णन्तः॑। अग्ने॑। दाशे॑म। प्र। ते॒। दि॒वः। न। स्त॒न॒य॒न्ति॒। शुष्माः॑॥४॥

पदार्थ : हे (अग्ने) बिजुली के सदृश वर्त्तमान राजन् ! हम लोग (अद्य) आज शीघ्र (आभिः) इन (गीर्भिः) बुद्धि आदि की बढ़ानेवाली वाणियों से (ते) आपके लिये (गृणन्तः) स्तुति करते हुए कर धन (दाशेम) देवें जिन (ते) आपके लिये (दिवः) बिजुली के (न) सदृश (शुष्माः) बलपराक्रमयुक्त जन (प्र, स्तनयन्ति) शब्द करते हैं, उन आपके लिये राज्य देवें ॥४॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो आप बिजुली के तुल्य मन्त्रियों की रक्षा करके हम लोगों की पालना करें तो हम लोग आपकी प्रजा हुए आज से लेकर आपकी निरन्तर प्रशंसा करें और बहुत धनादि सम्पत्ति देवें ॥४॥