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Rigveda / 4 / 12 / 3

अ॒ग्निरी॑शे बृह॒तः क्ष॒त्रिय॑स्या॒ग्निर्वाज॑स्य पर॒मस्य॑ रा॒यः। दधा॑ति॒ रत्नं॑ विध॒ते यवि॑ष्ठो॒ व्या॑नु॒षङ्मर्त्या॑य स्व॒धावा॑न् ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 12 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒ग्निः। ई॒शे॒। बृ॒ह॒तः। क्ष॒त्रिय॑स्य। अ॒ग्निः। वाज॑स्य। प॒र॒मस्य॑। रा॒यः। दधा॑ति। रत्न॑म्। वि॒ध॒ते। यवि॑ष्ठः। वि। आ॒नु॒षक्। मर्त्या॑य। स्व॒धा॑ऽवान् ॥३॥

पदार्थ : हे राजा और प्रजाजनो ! जो (अग्निः) अग्नि के सदृश जन (क्षत्रियस्य) क्षात्रधर्मयुक्त (बृहतः) बड़े (वाजस्य) वेग विज्ञान और (परमस्य) अत्यन्त श्रेष्ठ (रायः) धन आदि के मध्य में (ईशे) ऐश्वर्य्य करता है तथा (यविष्ठः) अत्यन्त युवा अर्थात् शरीर और आत्मा के बल से और (स्वधावान्) बहुत अन्न आदि से युक्त (आनुषक्) अनुकूल हुआ (विधते) विधान करते हुए (मर्त्याय) मरण धर्मवाले मनुष्य के लिये (अग्निः) बिजुली के समान वर्त्तमान (रत्नम्) रमण करने योग्य धन को (वि, दधाति) विधान करता है, वह सब लोगों से सत्कार करने योग्य है ॥३॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य और बिजुली के सदृश राज्य और ऐश्वर्य्य की उन्नति करते हुए यश को विस्तारते हैं, वे सब से सब प्रकार सत्कार को प्राप्त होते हैं ॥३॥