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Rigveda / 4 / 13 / 3

यं सी॒मकृ॑ण्व॒न्तम॑से वि॒पृचे॑ ध्रु॒वक्षे॑मा॒ अन॑वस्यन्तो॒ अर्थ॑म्। तं सूर्यं॑ ह॒रितः॑ स॒प्त य॒ह्वीः स्पशं॒ विश्व॑स्य॒ जग॑तो वहन्ति ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 13 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यम्। सी॒म्। अकृ॑ण्वन्। तम॑से। वि॒ऽपृचे॑। ध्रु॒वऽक्षे॑माः। अन॑वऽस्यन्तः। अर्थ॑म्। तम्। सूर्य॑म्। ह॒रितः॑। स॒प्त। य॒ह्वीः। स्पश॑म्। विश्व॑स्य। जग॑तः। व॒ह॒न्ति॒ ॥३॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यम्) जिस (अर्थम्) पदार्थरूप सूर्य को (अनवस्यन्तः) न सेवते और क्रिया करते हुए (ध्रुवक्षेमाः) निश्चित रक्षण करनेवाले जन (तमसे) अन्धकार के अर्थ (विपृचे) वियोग करने के लिये (सीम्) सब ओर से (अकृण्वन्) निश्चित करते हैं (तम्) उस (विश्वस्य) सम्पूर्ण (जगतः) संसार के (स्पशम्) बाँधनेवाले (सूर्य्यम्) सूर्य्य को (सप्त) सात (यह्वीः) बड़ी (हरितः) दिशाओं को (वहन्ति) प्राप्त कराते हैं, वैसे ही उत्तम गुणों को प्राप्त कराओ ॥३॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे किरणें सूर्य्य को अन्धकार के दूर करने के लिये धारण करती हैं, वैसे ही सम्पूर्ण जगत् की अविद्या दूर करने के लिये और विद्या की रक्षा के लिये सब प्रकार सत्य के उपदेश करो ॥३॥