Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 15 / 4

अ॒यं यः सृञ्ज॑ये पु॒रो दै॑ववा॒ते स॑मि॒ध्यते॑। द्यु॒माँ अ॑मित्र॒दम्भ॑नः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 15 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अग्निः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒यम्। यः। सृञ्ज॑ये। पु॒रः। दै॒व॒ऽवा॒ते। स॒म्ऽइ॒ध्यते॑। द्यु॒ऽमान्। आ॒मि॒त्र॒ऽदम्भ॑नः ॥४॥

पदार्थ : हे राजन् ! (यः) जो (अयम्) यह (द्युमान्) बहुत विद्या के प्रकाश से युक्त (अमित्रदम्भनः) शत्रुओं का नाशकर्त्ता (पुरः) प्रथम (दैववाते) विद्वान् जनों के प्राप्तसुख में (सृञ्जये) पाये हुए शत्रुओं को जिसमें जीतता है, उस संग्राम में (समिध्यते) प्रकाशित होता है, वही आपके सत्कार करने योग्य है ॥४॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो लोग बड़े संग्राम में तेजस्वी, भयरहित, आगे चलनेवाले और शत्रुओं के नाशकर्त्ता नौकर हों, उनका ही आप पुत्र के सदृश पालन करो ॥४॥