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Rigveda / 4 / 15 / 10

तं यु॒वं दे॑वावश्विना कुमा॒रं सा॑हदे॒व्यम्। दी॒र्घायु॑षं कृणोतन ॥१०॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 15 | Mantra No : 10

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अश्विनौ | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : तम्। यु॒वम्। दे॒वौ॒। अ॒श्वि॒ना॒। कु॒मा॒रम्। सा॒ह॒ऽदे॒व्यम्। दी॒र्घऽआ॑युषम्। कृ॒णो॒त॒न॒ ॥१०॥

पदार्थ : हे (देवौ) विद्या के देनेवाले (अश्विना) श्रेष्ठ गुणों में व्यापक (युवम्) आप दोनों (तम्) उस पढ़नेवाले (साहदेव्यम्) विद्वानों के उत्तम साथी (कुमारम्) ब्रह्मचारी को (दीर्घायुषम्) अधिक अवस्थावाला (कृणोतन) करो ॥१०॥

भावार्थ : हे विद्वानो और विदुषियो ! आप लोग पढ़ाने के लिये प्रवृत्त हो और उत्तम शिक्षा करके और विद्या के योग को सम्पादन करके सब श्रेष्ठ पुरुषों को बहुत कालपर्य्यन्त जीवनेवाले करो ॥१०॥ इस सूक्त में अग्नि, राजा अध्यापक और पढ़नेवाले के कर्मों का वर्णन करने से इस सूक्त के अर्थ की इस से पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति जाननी चाहिये ॥१०॥ यह पन्द्रहवाँ सूक्त और सोलहवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥