Rigveda / 4 / 16 / 9
अच्छा॑ क॒विं नृ॑मणो गा अ॒भिष्टौ॒ स्व॑र्षाता मघव॒न्नाध॑मानम्। ऊ॒तिभि॒स्तमि॑षणो द्यु॒म्नहू॑तौ॒ नि मा॒यावा॒नब्र॑ह्मा॒ दस्यु॑रर्त ॥९॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 16 | Mantra No : 9
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRittriShTup | Tone : dhaivataH
Subject : English Translation Under Process
Verse : achChaa kavi.m nRRimaNo gaa abhiShTau svarShaataa maghavannaadhamaanam. uutibhistamiShaNo dyumnahuutau ni maayaavaanabrahmaa dasyurarta .9.
Component Words : achCha. kavim. nRRi.amanaH. gaaH. abhiShTau. svaH.asaataa. magha.avan. naadhamaanam. uuti.abhiH. tam. iShaNaH. dyumna.ahuutau. ni. maayaa.avaan. abrahmaa. dasyuH. arta .9.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अच्छ॑। क॒विम्। नृ॒ऽम॒नः॒। गाः॒। अ॒भिष्टौ॑। स्वः॑ऽसाता। म॒घ॒ऽव॒न्। नाध॑मानम्। ऊ॒तिऽभिः॑। तम्। इ॒ष॒णः॒। द्यु॒म्नऽहू॑तौ। नि। मा॒याऽवा॑न्। अब्र॑ह्मा। दस्युः॑। अ॒र्त॒ ॥९॥
पदार्थ : हे (नृमणः) मनुष्यों में मन रखनेवाले (मघवन्) बहुत धन से युक्त ! (स्वर्षाता) सुख के अन्त को प्राप्त आप (ऊतिभिः) रक्षण आदि से (अभिष्टौ) अभीष्ट की सिद्धि होने पर (द्युम्नहूतौ) धन और यश की प्राप्ति जिसमें उसमें (गाः) वाणियों को (नाधमानम्) ईश्वरीय भाव को पहुँचाते हुए (कविम्) विद्वान् को (अच्छ) उत्तम प्रकार प्रेरणा करें और जो (मायावान्) निकृष्ट बुद्धियुक्त (अब्रह्मा) वेद को नहीं जाननेवाला (दस्युः) दुष्ट स्वभावयुक्त पुरुष [का] (अर्त्त) नाश हो (तम्) उसको आप (नि, इषणः) निकालें ॥९॥
भावार्थ : हे राजन् ! आप कपटी, मूर्ख और दुष्ट स्वभाववाले मनुष्यों का नाश करके और धार्मिक विद्वानों का सत्कार करके प्रशंसित हुए हम लोगों के राजा हूजिये ॥९॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : अच्छ॑। क॒विम्। नृ॒ऽम॒नः॒। गाः॒। अ॒भिष्टौ॑। स्वः॑ऽसाता। म॒घ॒ऽव॒न्। नाध॑मानम्। ऊ॒तिऽभिः॑। तम्। इ॒ष॒णः॒। द्यु॒म्नऽहू॑तौ। नि। मा॒याऽवा॑न्। अब्र॑ह्मा। दस्युः॑। अ॒र्त॒ ॥९॥
पदार्थ : (अच्छ) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (कविम्) विद्वांसम् (नृमणः) नृषु मनो यस्य तत्सम्बुद्धौ (गाः) वाचः (अभिष्टौ) अभीष्टसिद्धौ (स्वर्षाता) सुखस्यान्तं प्राप्तः (मघवन्) बहुधनयुक्त (नाधमानम्) ऐश्वर्य्यं कुर्वाणम् (ऊतिभिः) रक्षणादिभिः (तम्) (इषणः) प्रेरयेः (द्युम्नहूतौ) धनयशसोर्हूतिः प्राप्तिर्यस्यां तस्याम् (नि) (मायावान्) कुत्सितप्रज्ञायुक्तः (अब्रह्मा) अवेदवित् (दस्युः) दुष्टस्वभावः (अर्त्त) नश्यतु ॥९॥
अन्वय : हे नृमणो मघवन् ! स्वर्षाता त्वमूतिभिरभिष्टौ द्युम्नहूतौ गा नाधमानं कविं चाच्छेषणो यो मायावानब्रह्मा दस्युरर्त्त तं त्वं नीषणो निस्सारय ॥९॥
भावार्थ : हे राजँस्त्वं कपटिनो मूर्खान् दस्यून् हत्वा धार्मिकान् विदुषः सत्कृत्य प्रशंसितः सन्नस्माकं राजा भव ॥९॥