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Rigveda / 4 / 16 / 12

कुत्सा॑य॒ शुष्ण॑म॒शुषं॒ नि ब॑र्हीः प्रपि॒त्वे अह्नः॒ कुय॑वं स॒हस्रा॑। स॒द्यो दस्यू॒न्प्र मृ॑ण कु॒त्स्येन॒ प्र सूर॑श्च॒क्रं वृ॑हताद॒भीके॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 16 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : कुत्सा॑य। शुष्ण॑म्। अ॒शुष॑म्। नि। ब॒र्हीः॒। प्र॒ऽपि॒त्वे। अह्नः॑। कुय॑वम्। स॒हस्रा॑। स॒द्यः। दस्यू॑न्। प्र। मृ॒ण॒। कु॒त्स्येन॑। प्र। सूरः॑। च॒क्रम्। वृ॒ह॒ता॒त्। अ॒भीके॑ ॥१२॥

पदार्थ : हे राजन् ! आप (अह्नः) दिन के (प्रपित्वे) उत्तम प्रकार प्राप्त होने पर (कुत्साय) निन्दित व्यवहार के लिये (कुयवम्) निकृष्ट यव जिसके उस (शुष्णम्) रसरहित (अशुषम्) दुःख को (नि, बर्हीः) दूर करो और जैसे (सूरः) सूर्य्य (चक्रम्) चक्र के सदृश वर्त्तमान ब्रह्माण्ड को (कुत्सेन) वैसे वज्र में हुए वेग से (सहस्रा) सहस्रों (दस्यून्) दुष्ट चोरों को (सद्यः) शीघ्र (प्र) (मृण) नाश कीजिये (अभीके) समीप में (प्र, वृहतात्) छेदन कीजिये ॥१२॥

भावार्थ : हे राजन् ! आप वज्र आदि शस्त्रों से दुष्ट चोरों का नाश करके सूर्य्य के सदृश प्रतापी हूजिये ॥१२॥