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Rigveda / 1 / 29 / 3

नि ष्वा॑पया मिथू॒दृशा॑ स॒स्तामबु॑ध्यमाने। आ तू न॑ इन्द्र शंसय॒ गोष्वश्वे॑षु शु॒भ्रिषु॑ स॒हस्रे॑षु तुवीमघ॥

Veda : Rigveda | Mandal : 1 | Sukta : 29 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : शुनःशेप आजीगर्तिः | देवता : इन्द्र: | छन्द : विराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर वह क्या-क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

पदपाठ : नि। स्वा॒प॒य॒। मि॒थु॒ऽदृशा॑। स॒स्ताम्। अबु॑ध्यमाने॒ इति॑। आ। तु। नः॒। इ॒न्द्र॒। शं॒स॒य॒। गोषु॑। अश्वे॑षु। शु॒भ्रिषु॑। स॒हस्रे॑षु। तु॒वी॒ऽम॒घ॒॥

पदार्थ : हे (तुविमघ) अनेक प्रकार के धनयुक्त (इन्द्र) अविद्यारूपी निद्रा और दोषों को दूर करनेवाले विद्वान् ! जो-जो (मिथूदृशा) विषयाशक्ति अर्थात् खोटे काम वा प्रमाद अच्छे कामों के विनाश को दिखानेवाले वा (अबुध्यमाने) बोधनिवारक शरीर और मन (सस्ताम्) शयन और पुरुषार्थ का नाश करते हैं, उनको आप (निष्वापय) अच्छे प्रकार निवारण कर दीजिये (तु) फिर (सहस्रेषु) हजारहों (शुभ्रिषु) प्रशंसनीय गुणवाले (गोषु) पृथिवी आदि पदार्थ वा (अश्वेषु) वस्तु-वस्तु में रहनेवाले अग्नि आदि पदार्थों में (नः) हम लोगों को (आशंसय) अच्छे गुणवाले कीजिये॥३॥

भावार्थ : मनुष्यों को शरीर और आत्मा से आलस्य को दूर छोड़ के उत्तम कर्मों में नित्य प्रयत्न करना चाहिये॥३॥