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Rigveda / 4 / 17 / 4

सु॒वीर॑स्ते जनि॒ता म॑न्यत॒ द्यौरिन्द्र॑स्य क॒र्ता स्वप॑स्तमो भूत्। य ईं॑ ज॒जान॑ स्व॒र्यं॑ सु॒वज्र॒मन॑पच्युतं॒ सद॑सो॒ न भूम॑ ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 17 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब राजसन्तानविचार को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : सु॒ऽवीरः॑। ते॒। ज॒नि॒ता। म॒न्य॒त॒। द्यौः। इन्द्र॑स्य। क॒र्ता। स्वपः॑ऽतमः। भू॒त्। यः। ई॒म्। ज॒जान॑। स्व॒र्य॑म्। सु॒ऽवज्र॑म्। अन॑पऽच्युतम्। सद॑सः। न। भूम॑ ॥४॥

पदार्थ : हे राजन् ! (इन्द्रस्य) अत्यन्त ऐश्वर्यवान् (ते) आप का (द्यौः) बिजुली के सदृश (सुवीरः) श्रेष्ठवीर (जनिता) उत्पन्न करनेवाला (मन्यत) माना जाय और वह (स्वपस्तमः) अतीव उत्तम कर्मों से पूरित (कर्त्ता) करनेवाला (भूत्) हो वा (यः) जो (ईम्) महान् (स्वर्य्यम्) अत्यन्त सुख के लिये हित और (अनपच्युतम्) नाश से रहित (सुवज्रम्) उत्तम आयुधोंवाले पुरुष को (जजान) उत्पन्न कर चुका उसको (सदसः) सभासदों के (न) सदृश हम लोग प्राप्त (भूम) होवें ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में उपमावाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। हे राजन् ! जैसे श्रेष्ठ लोग अति उत्तम राजा को प्राप्त होकर और न्याय का प्रचार करके यशवाले होते हैं, इसी प्रकार यदि आप धर्मयुक्त ब्रह्मचर्य्य से पुत्रेष्टिकर्म्म की रीति से अपनी प्रिया में पुत्र उत्पन्न करें तो वह भी प्रसिद्ध यशवाला होवे ॥४॥