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Rigveda / 4 / 17 / 8

स॒त्रा॒हणं॒ दाधृ॑षिं॒ तुम्र॒मिन्द्रं॑ म॒हाम॑पा॒रं वृ॑ष॒भं सु॒वज्र॑म्। हन्ता॒ यो वृ॒त्रं सनि॑तो॒त वाजं॒ दाता॑ म॒घानि॑ म॒घवा॑ सु॒राधाः॑ ॥८॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 17 | Mantra No : 8

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब प्रजाजनों से राजा के स्वीकार करने को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒त्रा॒ऽहन॑म्। दधृ॑षिम्। तुम्र॑म्। इन्द्र॑म्। म॒हाम्। अ॒पा॒रम्। वृ॒ष॒भम्। सु॒ऽवज्र॑म्। हन्ता॑। यः। वृ॒त्रम्। सनि॑ता। उ॒त। वाज॑म्। दाता॑। म॒घानि॑। म॒घऽवा॑। सु॒ऽराधाः॑ ॥८॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (यः) जो (वृत्रम्) मेघ को जैसे सूर्य वैसे शत्रुओं का (हन्ता) नाश करनेवाला पुरुष (वाजम्) अन्न आदि ऐश्वर्य्य का (सनिता) विभाग करनेवाला (उत) भी (मघवा) बहुत धन से युक्त (सुराधाः) धर्मयुक्त व्यवहार से धनसंचयकर्त्ता (मघानि) और धनों का (दाता) दाता हो उस (सत्राहणम्) सत्य से असत्य के नाश करनेवाले (दाधृषिम्) निरन्तर प्रगल्भ (महाम्) महान् (अपारम्) अपार विद्यावान् गम्भीर आशय युक्त (तुम्रम्) प्रेरणा देनेवाले (वृषभम्) बलिष्ठ (सुवज्रम्) सुन्दर शस्त्र और अस्त्रों के प्रयोगकर्त्ता (इन्द्रम्) अत्यन्त ऐश्वर्य्ययुक्त राजा को स्वीकार करो ॥८॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो पूर्णविद्यायुक्त, सत्यवादी, प्रगल्भ, बलिष्ठ, शस्त्र और अस्त्रों का चलानेवाला और अभयदाता पुरुष हो; उसी को राज्य के लिये नियत करो ॥८॥