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Rigveda / 4 / 17 / 17

त्रा॒ता नो॑ बोधि॒ ददृ॑शान आ॒पिर॑भिख्या॒ता म॑र्डि॒ता सो॒म्याना॑म्। सखा॑ पि॒ता पि॒तृत॑मः पितॄ॒णां कर्ते॑मु लो॒कमु॑श॒ते व॑यो॒धाः ॥१७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 17 | Mantra No : 17

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब ईश्वरोपासना विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : त्रा॒ता। नः॒। बो॒धि॒। ददृ॑शानः। आ॒पिः। अ॒भि॒ऽख्या॒ता। म॒र्डि॒ता। सो॒म्याना॑म्। सखा॑।। पि॒ता। पि॒तृऽत॑मः। पि॒तॄ॒णाम्। कर्ता॑। ई॒म्। ऊ॒म् इति॑। लो॒कम्। उ॒श॒ते। व॒यः॒ऽधाः ॥१७॥

पदार्थ : हे विद्वन् ! जो (नः) हम लोगों का वा हम लोगों को (त्राता) रक्षा करने (ददृशानः) उत्तम प्रकार देखने (आपिः) व्याप्त रहने (अभिख्याता) सम्मुख अन्तर्यामीपने से उपदेश देने (मर्डिता) सुख देने और (सखा) मित्र (पिता) संसार का उत्पन्न करनेवाला (सोम्यानाम्) चन्द्रमा के तुल्य शान्ति आदि गुणों से युक्त (पितॄणाम्) उत्पन्न वा पालन करनेवालों का (पितृतमः) अत्यन्त पालन करनेवाला (कर्त्ता) कर्त्तापुरुष (लोकम्) लोक की (उशते) कामना करते हुए के लिये (ईम्) सब को (उ) ही (वयोधाः) जीवन वा सुन्दर वस्तु का धारण करनेवाला जगदीश्वर है, ऐसा उसको (बोधि) जानो ॥१७॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो जगदीश्वर मित्र के तुल्य सब का सुखकर्त्ता, सत्य का उपदेश देनेवाला, उत्पन्न करनेवालों का उत्पन्नकर्त्ता, पालन करनेवालों का पालनकर्त्ता, सब कर्म्मों का देखनेवाला, न्यायाधीश, अन्तर्य्यामी अभिव्याप्त है, उसी को जानकर उपासना करो ॥१७॥