Rigveda / 4 / 20 / 7
न यस्य॑ व॒र्ता ज॒नुषा॒ न्वस्ति॒ न राध॑स आमरी॒ता म॒घस्य॑। उ॒द्वा॒वृ॒षा॒णस्त॑विषीव उग्रा॒स्मभ्यं॑ दद्धि पुरुहूत रा॒यः ॥७॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 20 | Mantra No : 7
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : svaraaTpa~Nkti | Tone : pa~nchamaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : na yasya vartaa januShaa nvasti na raadhasa aamariitaa maghasya. udvaavRRiShaaNastaviShiiva ugraasmabhya.m daddhi puruhuuta raayaH .7.
Component Words : na. yasya. vartaa. januShaa. nu. asti. na. raadhasaH. aa.amariitaa. maghasya. ut.avavRRiShaaNaH. taviShii.avaH. ugra. asmabhyam. daddhi. puru.ahuuta. raayaH. .7.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : न। यस्य॑। व॒र्ता। ज॒नुषा॑। नु। अस्ति॑। न। राध॑सः। आऽम॒री॒ता। म॒घस्य॑। उ॒त्ऽव॒वृ॒षा॒णः। त॒वि॒षी॒ऽवः॒। उ॒ग्र॒। अ॒स्मभ्य॑म्। द॒द्धि॒। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। रा॒यः। ॥७॥
पदार्थ : हे (पुरुहूत) बहुतों के पुकारनेवाले (उग्र) प्रतापी राजन् (यस्य) जिसका (जनुषा) जन्म से (वर्त्ता) निवारण करनेवाला कोई भी (न) नहीं (अस्ति) है जिसके (मघस्य) धन और (राधसः) धनरूप अन्न का (आमरीता) सब प्रकार नाश करनेवाला (न) नहीं विद्यमान है। हे (उद्वावृषाणः) उत्तमता से अत्यन्त बल करनेवाले की (तविषीवः) बलयुक्त सेनावान् जीतनेवाला वह आप (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (रायः) धनों को (नु) निश्चय से (दद्धि) दीजिये ॥७॥
भावार्थ : इस मन्त्र में उपमालङ्कार है । हे मनुष्यो ! जिसका उत्तम कुल में जन्म और जिसका कुल प्रशंसित कर्म्म किये गये के समान और जिसका संग्राम में वा विचार में रोकनेवाला नहीं है, वही सुख देनेवाला राजा हम लोगों का होवे, ऐसी हम लोग इच्छा करें ॥७॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : न। यस्य॑। व॒र्ता। ज॒नुषा॑। नु। अस्ति॑। न। राध॑सः। आऽम॒री॒ता। म॒घस्य॑। उ॒त्ऽव॒वृ॒षा॒णः। त॒वि॒षी॒ऽवः॒। उ॒ग्र॒। अ॒स्मभ्य॑म्। द॒द्धि॒। पु॒रु॒ऽहू॒त॒। रा॒यः। ॥७॥
पदार्थ : (न) निषेधे (यस्य) (वर्त्ता) निवारकः (जनुषा) जन्मना (नु) (अस्ति) (न) निषेधे (राधसः) धनाऽन्नस्य (आमरीता) समन्ताद्विनाशकः (मघस्य) धनस्य (उद्वावृषाणः) उत्कृष्टतया भृशम्बलकरस्य (तविषीवः) बलवत्सेनावन् (उग्र) प्रतापिन् (अस्मभ्यम्) (दद्धि) देहि (पुरुहूत) बहूनामाह्वयक (रायः) धनानि ॥७॥
अन्वय : हे पुरुहूतोग्र राजन् ! यस्य जनुषा वर्त्ता कोऽपि नास्ति यस्य मघस्य राधस आमरीता न विद्यते। उद्वावृषाणस्तविषीवो विजयी स त्वमस्मभ्यं रायो नु दद्धि ॥७॥
भावार्थ : अत्रोपमालङ्कारः । हे मनुष्या ! यस्योत्तमकुले जन्म यस्य कुलं प्रशंसितं कर्म्म कृतवद् यस्य संग्रामे विचारे वा रोधको न विद्यते स एव सुखदाता राजाऽस्माकम्भवेदिति वयमिच्छेम ॥७॥