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Rigveda / 4 / 21 / 7

स॒त्रा यदीं॑ भार्व॒रस्य॒ वृष्णः॒ सिष॑क्ति॒ शुष्मः॑ स्तुव॒ते भरा॑य। गुहा॒ यदी॑मौशि॒जस्य॒ गोहे॒ प्र यद्धि॒ये प्राय॑से॒ मदा॑य ॥७॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 21 | Mantra No : 7

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : भुरिक्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब राजविषयान्तर्गत राजभृत्यों के कर्म को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : स॒त्रा। यत्। ई॒म्। भा॒र्व॒रस्य॑। वृष्णः॑। सिस॑क्ति। शुष्मः॑। स्तु॒व॒ते। भराय॑। गुहा॑। यत्। ई॒म्। औ॒शि॒जस्य॑। गोहे॑। प्र। यत्। धि॒ये। प्र। अय॑से। मदा॑य ॥७॥

पदार्थ : (यत्) जो (शुष्मः) बलवान् (सत्रा) सत्य से (ईम्) सब प्रकार (भार्वरस्य) प्रजा के पालन करनेवाले राजा के (वृष्णः) बलिष्ठ की (स्तुवते) प्रशंसा करते हुए (भराय) धारण करनेवाले के लिए (सिषक्ति) सींचता है और (यत्) जो (गुहा) बुद्धि में (औशिजस्य) कामना करनेवालों में चतुर के (गोहे) स्वीकार करने योग्य घर में सत्य का (प्र) सिञ्चन करता है (यत्) जो (अयसे) गमन (मदाय) आनन्द और (धिये) बुद्धि के लिये बुद्धि में प्रज्ञान को (ईम्) सब प्रकार से (प्र) अत्यन्त सींचता है, वही सम्पूर्ण लाभ को प्राप्त होता है ॥७॥

भावार्थ : जो कर्मचारी लोग धर्म से राज्य का शासन करते हुए राजा के राज्य में सत्य-न्याय से प्रजाओं का पालन करते हैं, वे अतुल आनन्द को प्राप्त होते हैं ॥७॥