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Rigveda / 4 / 22 / 9

अ॒स्मे वर्षि॑ष्ठा कृणुहि॒ ज्येष्ठा॑ नृ॒म्णानि॑ स॒त्रा स॑हुरे॒ सहां॑सि। अ॒स्मभ्यं॑ वृ॒त्रा सु॒हना॑नि रन्धि ज॒हि वध॑र्व॒नुषो॒ मर्त्य॑स्य ॥९॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 22 | Mantra No : 9

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : स्वराट्पङ्क्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒स्मे इति॑। वर्षि॑ष्ठा। कृ॒णु॒हि॒। ज्येष्ठा॑। नृ॒म्णानि॑। स॒त्रा। स॒हु॒रे॒। सहां॑सि। अ॒स्मभ्य॑म्। वृ॒त्रा। सु॒ऽहना॑नि। र॒न्धि॒। ज॒हि। वधः॑। व॒नुषः॑। मर्त्य॑स्य ॥९॥

पदार्थ : हे (सहुरे) सहनशील राजन् ! जो आपके (सत्रा) सत्य (वर्षिष्ठा) अत्यन्त वृद्ध (ज्येष्ठा) प्रशंसा करने योग्य (नृम्णानि) धन (सहांसि) और सहन वर्त्तमान हैं उनको (अस्मे) हम लोगों में (कृणुहि) करो (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये दुःख देनेवाले (वनुषः) सेवा करते हुए (मर्त्त्यस्य) मनुष्य के (वधः) मारने के साधन को (जहि) दूर फेंको और (सुहनानि) उत्तम प्रकार नाश करने योग्य (वृत्रा) मेघ बादलों के समान शत्रुओं की सेनाओं का (रन्धि) नाश कीजिये ॥९॥

भावार्थ : हे राजा आदि जनो ! आप लोग मिल के प्रजा को पीड़ा देनेवाले के बल का नाश करो और जो आप लोगों के उत्तम वस्तु उनको हम लोगों में धारण कीजिये और जो हम लोगों के उत्तम रत्न उनको आप लोग धरें ॥९॥