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Rigveda / 4 / 23 / 3

क॒था शृ॑णोति हू॒यमा॑न॒मिन्द्रः॑ क॒था शृ॒ण्वन्नव॑सामस्य वेद। का अ॑स्य पू॒र्वीरुप॑मातयो ह क॒थैन॑माहुः॒ पपु॑रिं जरि॒त्रे ॥३॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 23 | Mantra No : 3

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : क॒था। शृ॒णो॒ति॒। हू॒यमा॑नम्। इन्द्रः॑। क॒था। शृ॒ण्वन्। अव॑साम्। अ॒स्य॒। वे॒द॒। काः। अ॒स्य॒। पू॒र्वीः। उप॑ऽमातयः। ह॒। क॒था। ए॒न॒म्। आ॒हुः॒। पपु॑रिम्। ज॒रि॒त्रे ॥३॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! (इन्द्रः) अध्यापक वा राजा (हूयमानम्) स्पर्द्धा करते हुए को (कथा) किस प्रकार (शृणोति) सुनता है और (शृण्वन्) सुनता हुआ (अस्य) इसके (अवसाम्) रक्षण आदिकों की स्पर्द्धा करते हुए को (कथा) किस प्रकार से (वेद) जाने (अस्य) इसकी (पूर्वीः) प्राचीन (उपमातयः) उपमा (ह) ही (काः) कौन हैं? अनन्तर (एनम्) इसको (जरित्रे) विद्वान् के लिये (पपुरिम्) पालन करनेवाला (कथा) किस प्रकार (आहुः) कहते हैं, ऐसा पूछना चाहिए ॥३॥

भावार्थ : जो विद्यार्थी और राजा के जन यथार्थवक्ता पुरुषों के वचनों के शास्त्रों को उत्तम प्रकार सुन, मान और निश्चय करके पुनः कर्मों का आरम्भ करते हैं, वे ही सम्पूर्ण जानने योग्य को जानते हैं ॥३॥