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Rigveda / 4 / 26 / 4

प्र सु ष विभ्यो॑ मरुतो॒ विर॑स्तु॒ प्र श्ये॒नः श्ये॒नेभ्य॑ आशु॒पत्वा॑। अ॒च॒क्रया॒ यत्स्व॒धया॑ सुप॒र्णो ह॒व्यं भर॒न्मन॑वे दे॒वजु॑ष्टम् ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 26 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब राजसेनाविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : प्र। सु। सः। विऽभ्यः॑। म॒रु॒तः॒। विः। अ॒स्तु॒। प्र। श्ये॒नः। श्ये॒नेभ्यः॑। आ॒शु॒ऽपत्वा॑। अ॒च॒क्रया॑। यत्। स्व॒धया॑। सु॒ऽप॒र्णः। ह॒व्यम्। भर॑त्। मन॑वे। दे॒वऽजु॑ष्टम् ॥४॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे (श्येनः) वाज (विः) पक्षी (श्येनेभ्यः) वाजनामक (विभ्यः) पक्षी विशेषों से (अचक्रया) अविद्यमान चक्राकारगति के साथ (आशुपत्वा) शीघ्र गिर के वेग को (भरत्) धारण करता है, वैसे (मरुतः) मनुष्य जन मनुष्यों की सेना के वेगादिगुण को (प्र) विशेष करके धारण करता है (यत्) जो (सुपर्णः) उत्तम पतनयुक्त (मनवे) मनुष्य के लिये (स्वधया) अन्न आदि से (देवजुष्टम्) विद्वानों से सेवित (हव्यम्) ग्रहण करने योग्य वस्तु को (प्र) अत्यन्त (सु) उत्तम प्रकार धारण करता है (सः) वह सब स्थानों में सुखकारी (अस्तु) हो ॥४॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! इस सृष्टि और अन्तरिक्ष में जैसे पक्षी आकाश में जाकर आते हैं, वैसे ही सब लोक और लोकान्तर घूमते हैं, जो सृष्टिविद्या को जानता है, वही मनुष्यादिकों का सुखकारी होता है ॥४॥