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Rigveda / 4 / 28 / 4

विश्व॑स्मात्सीमध॒माँ इ॑न्द्र॒ दस्यू॒न्विशो॒ दासी॑रकृणोरप्रश॒स्ताः। अबा॑धेथा॒ममृ॑णतं॒ नि शत्रू॒नवि॑न्देथा॒मप॑चितिं॒ वध॑त्रैः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 28 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवः | देवता : इन्द्रासोमौ | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : विश्व॑स्मात्। सी॒म्। अ॒ध॒मान्। इ॒न्द्र॒। दस्यू॑न्। विशः॑। दासीः॑। अ॒कृ॒णोः॒। अ॒प्र॒ऽश॒स्ताः। अबा॑धेथाम्। अमृ॑णतम्। नि। शत्रू॑न्। अवि॑न्देथाम्। अप॑ऽचितिम्। वध॑त्रैः ॥४॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) दुष्टों के नाश करनेवाले आप (सीम्) सूर्य्य के सदृश (दासीः) देनेवाली (विशः) प्रजाओं को (अप्रशस्ताः) श्रेष्ठ सुख से रहित करते हुए (अधमान्) पाप के आचरण करनेवाले (दस्यून्) दुष्टों को (विश्वस्मात्) सब से पीड़ायुक्त (अकृणोः) करें। हे राजा और प्रजाजनो मिलकर आप दोनों (वधत्रैः) वधों से (शत्रून्) शत्रुओं को (अबाधेथाम्) बाधा देओ और प्रजा को (अमृणतम्) सुख देओ (अपचितिम्) सत्कार को (नि) अत्यन्त (अविन्देथाम्) प्राप्त होओ ॥४॥

भावार्थ : हे राजा आदि राजजनो ! जो साहस कर्म्म करने और जो दुष्ट उपदेश से प्रजा को दोषयुक्त करनेवाले नीच जन होवें, उनको निरन्तर बाधा देओ और श्रेष्ठों का सत्कार करो। ऐसा करने पर आप लोगों का बड़ा सत्कार होगा, यह जानना चाहिये ॥४॥