Rigveda / 4 / 30 / 3
विश्वे॑ च॒नेद॒ना त्वा॑ दे॒वास॑ इन्द्र युयुधुः। यदहा॒ नक्त॒माति॑रः ॥३॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 30 | Mantra No : 3
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : vishve chanedanaa tvaa devaasa indra yuyudhuH. yadahaa naktamaatiraH .3.
Component Words : vishve. chana. it. anaa. tvaa. devaasaH. indra. yuyudhuH. yat. ahaa. naktam. aa. atiraH .3.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : विश्वे॑। च॒न। इत्। अ॒ना। त्वा॒। दे॒वासः॑। इ॒न्द्र॒। यु॒यु॒धुः॒। यत्। अहा॑। नक्त॑म्। आ। अति॑रः ॥३॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) शत्रुओं के विदीर्ण करनेवाले (यत्) जो (विश्वे इत्) सभी (देवासः) विद्वान् जन (अना) प्रतिज्ञास्वरूप (अहा) दिनों और (नक्तम्) रात्रि को (त्वा) आपका आश्रय लेकर शत्रुओं के साथ (युयुधुः) युद्ध करते हैं, उनके (चन) भी साथ आप शत्रुओं का (आ, अतिरः) नाश करिये ॥३॥
भावार्थ : राजा को चाहिये कि भृत्यजन उत्तम शिक्षित और श्रेष्ठ रक्खें, जिससे दिन-रात्रि शत्रु लोग छिपे हुए रहें ॥३॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : विश्वे॑। च॒न। इत्। अ॒ना। त्वा॒। दे॒वासः॑। इ॒न्द्र॒। यु॒यु॒धुः॒। यत्। अहा॑। नक्त॑म्। आ। अति॑रः ॥३॥
पदार्थ : (विश्वे) (सर्वे) (चन) अपि (इत्) (अना) प्रणात्मकानि (त्वा) त्वाम् (देवासः) विद्वांसः (इन्द्र) शत्रूणां विदारक (युयुधुः) युध्यन्ते (यत्) ये (अहा) दिनानि (नक्तम्) रात्रिम् (आ, अतिरः) हन्याः ॥३॥
अन्वय : हे इन्द्र ! यद्ये विश्व इद् देवासोऽनाऽहा नक्तं त्वाश्रित्य शत्रुभिः सह युयुधुस्तैश्चन त्वं शत्रूनातिरः ॥३॥
भावार्थ : राज्ञा भृत्याः सुशिक्षिताः श्रेष्ठ रक्षणीया येनाहर्निशं शत्रवो निलीना निवसेयुः ॥३॥