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Rigveda / 4 / 30 / 14

उ॒त दा॒सं कौ॑लित॒रं बृ॑ह॒तः पर्व॑ता॒दधि॑। अवा॑हन्निन्द्र॒ शम्ब॑रम् ॥१४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 30 | Mantra No : 14

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर सूर्यदृष्टान्त से राजविषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : उ॒त। दा॒सम्। कौ॒लि॒ऽत॒रम्। बृ॒ह॒तः। पर्व॑तात्। अधि॑। अव॑। अ॒ह॒न्। इ॒न्द्र॒। शम्ब॑रम् ॥१४॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) तेजस्वि राजन् ! आप जैसे सूर्य्य (बृहतः) बड़े (पर्वतात्) पर्वत से (अधि) ऊपर (शम्बरम्) सुख प्राप्त होता है, जिससे उस मेघ को (अव, अहन्) नाश करता और (उत) भी प्रजाओं को पालता है, वैसे ही शत्रुओं का नाश करके (कौलितरम्) अत्यन्त कुलीन (दासम्) सेवक का पालन करो ॥१४॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जैसे सूर्य्य मेघ से जल को पृथिवी में गिरा के सब को जिलाता है, वैसे ही पर्वत के ऊपर स्थित भी डाकुओं को नीचे गिरा के प्रजाओं का पालन करो ॥१४॥