Rigveda / 4 / 31 / 2
कस्त्वा॑ स॒त्यो मदा॑नां॒ मंहि॑ष्ठो मत्स॒दन्ध॑सः। दृ॒ळ्हा चि॑दा॒रुजे॒ वसु॑ ॥२॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 31 | Mantra No : 2
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : kastvaa satyo madaanaa.m ma.mhiShTho matsadandhasaH. dRRiLhaa chidaaruje vasu .2.
Component Words : kaH. tvaa. satyaH. madaanaam. ma.mhiShThaH. matsat. andhasaH. dRRiLhaa. chit. aa.aruje. vasu .2.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : कः। त्वा॒। स॒त्यः। मदा॑नाम्। मंहि॑ष्ठः। म॒त्स॒त्। अन्ध॑सः। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। आ॒ऽरुजे॑। वसु॑ ॥२॥
पदार्थ : हे मनुष्य (मदानाम्) आनन्दों और (अन्धसः) अन्न आदि के सम्बन्ध में (मंहिष्ठः) अत्यन्त बड़ा (सत्यः) श्रेष्ठों में श्रेष्ठ (त्वा) आपको (मत्सत्) आनन्द देवे और (आरुजे) सब प्रकार से रोग के लिये (दृळ्हा) दृढ़ (वसु) धनरूप (चित्) भी (कः) कौन होवे अर्थात् रोग के दूर करने को अत्यन्त संलग्न कौन हो ॥२॥
भावार्थ : जो मनुष्य ब्रह्मचर्य्य आदि धर्म्माचरण से यथायोग्य आहार और विहार करें तो उनमें कभी दारिद्र्य और रोग नहीं आवे ॥२॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : कः। त्वा॒। स॒त्यः। मदा॑नाम्। मंहि॑ष्ठः। म॒त्स॒त्। अन्ध॑सः। दृ॒ळ्हा। चि॒त्। आ॒ऽरुजे॑। वसु॑ ॥२॥
पदार्थ : (कः) (त्वा) (सत्यः) सत्सु साधुः (मदानाम्) आनन्दानाम् (मंहिष्ठः) अतिशयेन महान् (मत्सत्) आनन्दयेत् (अन्धसः) अन्नादेः (दृळ्हा) दृढानि (चित्) अपि (आरुजे) समन्ताद्रोगाय (वसु) धनानि ॥२॥
अन्वय : हे मनुष्य ! मदानामन्धसो मंहिष्ठः सत्यस्त्वा मत्सदारुजे दृळ्हा वसु चित्को भवेत् ॥२॥
भावार्थ : यदि मनुष्या ब्रह्मचर्यादिधर्म्माचरणेन यथावदाहारविहारौ कुर्युस्तर्हि तेषु कदाचिद्दारिद्र्यं रोगश्च नैवागच्छेत् ॥२॥