Rigveda / 4 / 31 / 6
सं यत्त॑ इन्द्र म॒न्यवः॒ सं च॒क्राणि॑ दधन्वि॒रे। अध॒ त्वे अध॒ सूर्ये॑ ॥६॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 31 | Mantra No : 6
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indra: | Metre : nichRRidgaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : sa.m yatta indra manyavaH sa.m chakraaNi dadhanvire. adha tve adha suurye .6.
Component Words : sam. yat. te. indra. manyavaH. sam. chakraaNi. dadhanvire. adha. tve iti. adha. suurye .6.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : सम्। यत्। ते॒। इ॒न्द्र॒। म॒न्यवः॑। सम्। च॒क्राणि॑। द॒ध॒न्वि॒रे। अध॑। त्वे इति॑। अध॑। सूर्ये॑ ॥६॥
पदार्थ : हे (इन्द्र) जीव (ते) तेरे (यत्) जो (मन्यवः) क्रोध आदि व्यवहार (चक्राणि) चक्र के सदृश वर्तमान कर्म्मों को (सम्, दधन्विरे) धारण करते हैं (अध) अनन्तर (त्वे) आप में धन को धारण करते (अध) इसके अनन्तर वे (सूर्य्य) सूर्य्य में प्रकाश के सदृश प्रताप को (सम्) धारण करते हैं ॥६॥
भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्य ! जो तू दुष्ट आचरण करनेवाले पर क्रोध और श्रेष्ठ आचरण करनेवाले के प्रति हर्ष करे तो सूर्य्य के सदृश प्रतापी होवे ॥६॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : सम्। यत्। ते॒। इ॒न्द्र॒। म॒न्यवः॑। सम्। च॒क्राणि॑। द॒ध॒न्वि॒रे। अध॑। त्वे इति॑। अध॑। सूर्ये॑ ॥६॥
पदार्थ : (सम्) (यत्) ये (ते) तव (इन्द्र) जीव (मन्यवः) क्रोधादयो व्यवहाराः (सम्) (चक्राणि) चक्रवद्वर्त्तमानानि कर्माणि (दधन्विरे) धरन्ति (अध) (त्वे) त्वयि (अध) (सूर्ये) सवितरि ॥६॥
अन्वय : हे इन्द्र ! ते यन्मन्यवश्चक्राणि संदधन्विरेऽध त्वे धनं दधत्यध ते सूर्य्ये प्रकाश इव प्रतापं संदधन्विरे ॥६॥
भावार्थ : अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। हे मनुष्य ! यदि त्वं दुष्टाचारं प्रति क्रोधं श्रेष्ठाचारं प्रत्याह्लादं कुर्यास्तर्हि त्वं सूर्य्य इव प्रतापी भवेः ॥६॥