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Rigveda / 4 / 31 / 12

अ॒स्माँ अ॑विड्ढि वि॒श्वहेन्द्र॑ रा॒या परी॑णसा। अ॒स्मान्विश्वा॑भिरू॒तिभिः॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 31 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒स्मान्। अ॒वि॒ड्ढि॒। वि॒श्वहा॑। इन्द्र॑। रा॒या। परी॑णसा। अ॒स्मान्। विश्वा॑भिः। ऊ॒तिऽभिः॑ ॥१२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) अत्यन्त ऐश्वर्य्य से युक्त राजन् ! आप (विश्वहा) सम्पूर्ण दिनों को (परीणसा) अनेक प्रकार के (राया) धन के साथ (अस्मान्) हम लोगों को (अविड्ढि) प्रवेश कराइये और (विश्वाभिः) सम्पूर्ण (ऊतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं से हम लोगों को प्रवेश कराईये अर्थात् युक्त करिये ॥१२॥

भावार्थ : वही उत्तम राजा और राजपुरुष हैं कि जो सब प्रकार रक्षा से प्रजा को धनाढ्य करें ॥१२॥