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Rigveda / 4 / 32 / 12

अवी॑वृधन्त॒ गोत॑मा॒ इन्द्र॒ त्वे स्तोम॑वाहसः। ऐषु॑ धा वी॒रव॒द्यशः॑ ॥१२॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 32 | Mantra No : 12

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्र: | छन्द : निचृद्गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अवी॑वृधन्त। गोत॑माः। इन्द्र॑। त्वे इति॑। स्तोमऽवाहसः। आ। ए॒षु॒। धाः॒। वी॒रऽव॑त्। यशः॑ ॥१२॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) विद्वन् जो (स्तोमवाहसः) प्रशंसा को प्राप्त करानेवाले (गोतमाः) विद्वान् जन (त्वे) आप में (वीरवत्) वीर पुरुष जिसमें विद्यमान उस (यशः) कीर्ति वा धन को (अवीवृधन्त) बढ़ावें (एषु) इनमें आप वीरयुक्त कीर्ति वा धन को (आ, धाः) अच्छे प्रकार धारण कीजिये ॥१२॥

भावार्थ : हे राजन् ! जो लोग उत्तम कर्म्म से आपकी कीर्ति को बढ़ावें, उनकी कीर्ति आप भी बढ़ाइये ॥१२॥