Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Rigveda / 4 / 33 / 4

यत्सं॒वत्स॑मृ॒भवो॒ गामर॑क्ष॒न्यत्सं॒वत्स॑मृ॒भवो॒ मा अपिं॑शन्। यत्सं॒वत्स॒मभ॑र॒न्भासो॑ अस्या॒स्ताभिः॒ शमी॑भिरमृत॒त्वमा॑शुः ॥४॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 33 | Mantra No : 4

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : ऋभवः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : यत्। स॒म्ऽवत्स॑म्। ऋ॒भवः॑। गाम्। अर॑क्षन्। यत्। स॒म्ऽवत्स॑म्। ऋ॒भवः॑। माः। अपिं॑शन्। यत्। स॒म्ऽवत्स॑म्। अभ॑रन्। भासः॑। अ॒स्याः॒। ताभिः॑। शमी॑भिः। अ॒मृ॒त॒त्वम्। आ॒शुः॒ ॥४॥

पदार्थ : (यत्) जो (ऋभवः) बुद्धिमान् पितृजन (संवत्सम्) प्राप्त बछड़े के सदृश सन्तानों को शिक्षा देते हैं (गाम्) वाणी की (अरक्षन्) रक्षा करते हैं और (यत्) जो (ऋभवः) बुद्धिमान् पितृ, आचार्य्यजन (संवत्सम्) एक हुए और प्रेम से पाले गये सन्तान के सदृश (माः) माताओं को (अपिंशन्) अवयवों के सहित करते हैं अर्थात् भरण-पोषण से उनके अङ्गों को पुष्ट करते और (यत्) जो मातृजन (भासः) प्रकाशमान (अस्याः) इस विद्या के (संवत्सम्) एकीभाव को प्राप्त प्रेम से पालित सन्तान का (अभरन्) धारण वा पोषण करते हैं, वे बुद्धिमान् पितृजन और मातृजन (ताभिः) उन मातृ-पितृ-आचार्य्य की सेवा और विद्या की प्राप्तियों और (शमीभिः) श्रेष्ठ कर्म्मों से (अमृतत्वम्) मोक्षभाव वा उत्तम आनन्द को (आशुः) प्राप्त होते हैं ॥४॥

भावार्थ : जो विद्वान् पितृजन अपने सन्तानों को ब्रह्मचर्य्य और विद्या [तथा विनय] से विद्या, बल और उत्तम गुण और कर्मों के आचरण [से] युक्त करते हैं, वे अत्यन्त सुख को प्राप्त होते हैं ॥४॥