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Rigveda / 4 / 42 / 6

अ॒हं ता विश्वा॑ चकरं॒ नकि॑र्मा॒ दैव्यं॒ सहो॑ वरते॒ अप्र॑तीतम्। यन्मा॒ सोमा॑सो म॒मद॒न्यदु॒क्थोभे भ॑येते॒ रज॑सी अपा॒रे ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 42 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : त्रसदस्युः पौरुकुत्स्यः | देवता : आत्मा | छन्द : निचृत्त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : अ॒हम्। ता। विश्वा॑। च॒क॒र॒म्। नकिः॑। मा॒। दैव्य॑म्। सहः॑। व॒र॒ते॒। अप्र॑तिऽइतम्। यत्। मा॒। सोमा॑सः। म॒मद॑न्। यत्। उ॒क्था। उ॒भे इति॑। भ॒ये॒ते॒ इति॑। रज॑सी॒ इति॑। अ॒पा॒रे इति॑ ॥६॥

पदार्थ : हे मनुष्यो ! जो (अहम्) मैं (ता) उन (विश्वा) सब कामों को (चकरम्) निरन्तर करता हूँ तथा जीव (यत्) जिस (दैव्यम्) विद्वानों में प्रिय (मा) मुझको और (अप्रतीतम्) नहीं जाने गये (सहः) बल को (वरते) स्वीकार करता है (यत्) जिस (मा) मेरी सेवा करते (सोमासः) ऐश्वर्य्यवाले (ममदन्) प्रसन्न होते हैं और मुझ से (उक्था) प्रशंसा करने योग्य (उभे) दोनों (अपारे) पाररहित अपरिमित (रजसी) सूर्य्यलोक और भूमिलोक (भयेते) कँपते हैं, उस मेरे सदृश कोई भी (नकिः) नहीं है ॥६॥

भावार्थ : हे मनुष्यो ! जो पदार्थ प्रत्यक्ष और जो नहीं प्रत्यक्ष हैं, वे सब मुझ से ही बनाये गये, मेरे में अनन्त बल है, मुझको प्राप्त होकर सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होते हैं और मेरे ही भय से सब लोगों के सहचारी जीव डरते हैं ॥६॥