Rigveda / 4 / 45 / 4
हं॒सासो॒ ये वां॒ मधु॑मन्तो अ॒स्रिधो॒ हिर॑ण्यपर्णा उ॒हुव॑ उष॒र्बुधः॑। उ॒द॒प्रुतो॑ म॒न्दिनो॑ मन्दिनि॒स्पृशो॒ मध्वो॒ न मक्षः॒ सव॑नानि गच्छथः ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 45 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : ashvinau | Metre : jagatii | Tone : niShaadaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : ha.msaaso ye vaa.m madhumanto asridho hiraNyaparNaa uhuva uSharbudhaH. udapruto mandino mandinispRRisho madhvo na makShaH savanaani gachChathaH .4.
Component Words : ha.msaasaH. ye. vaam. madhu.amantaH. asridhaH. hiraNya.aparNaaH. uhuvaH. uShaH.abudhaH. uda.aprutaH. mandinaH. mandi.anispRRishaH. madhvaH. na. makShaH. savanaani. gachChathaH .4.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : हं॒सासः॑। ये। वा॒म्। मधु॑ऽमन्तः। अ॒स्रिधः॑। हिर॑ण्यऽपर्णाः। उ॒हुवः॑। उ॒षः॒ऽबुधः॑। उ॒द॒ऽप्रुतः॑। म॒न्दिनः॑। म॒न्दि॒ऽनि॒स्पृशः॑। मध्वः॑। न। मक्षः॑। सव॑नानि। ग॒च्छ॒थः॒ ॥४॥
पदार्थ : हे राजा और सेना के ईश जन ! (वाम्) आप दोनों के (ये) जो (मधुमन्तः) मधुर गमन से युक्त (अस्रिधः) नहीं मारे गये (हिरण्यपर्णाः) तेजमय वा सुवर्ण आदि से बने हुए पंख जिनके (उषर्बुधः) जो प्रातःकाल में बोध से युक्त (उहुवः) भारों के ले चलने (उदप्रुतः) जल के चलाने (मन्दिनः) आनन्द के देने और (मन्दिनिस्पृशः) आनन्द के स्पर्श करानेवाले (मध्वः) मधुर पदार्थ के सम्बन्ध में (मक्षः) मक्षियों के राजा के (न) सदृश (हंसासः) तथा हंस के सदृश शीघ्र चलनेवाले घोड़े हैं, उनसे (सवनानि) ऐश्वर्य्यों को आप दोनों (गच्छथः) प्राप्त होते हैं ॥४॥
भावार्थ : हे राजपुरुषो ! आप लोग वाहनों की कलों में अग्निजलादि के संप्रयोग से शीघ्र आ आकर ऐश्वर्य्य की इच्छा करें तो क्या रत्न को न प्राप्त होवें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : अश्विनौ | छन्द : जगती | स्वर : निषादः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : हं॒सासः॑। ये। वा॒म्। मधु॑ऽमन्तः। अ॒स्रिधः॑। हिर॑ण्यऽपर्णाः। उ॒हुवः॑। उ॒षः॒ऽबुधः॑। उ॒द॒ऽप्रुतः॑। म॒न्दिनः॑। म॒न्दि॒ऽनि॒स्पृशः॑। मध्वः॑। न। मक्षः॑। सव॑नानि। ग॒च्छ॒थः॒ ॥४॥
पदार्थ : (हंसासः) हंस इव सद्यो गन्तारोऽश्वाः। हंसास इत्यश्वनामसु पठितम्। (निघं०१.१४) (ये) (वाम्) युवयोः (मधुमन्तः) मधुगत्योपेताः (अस्रिधः) अहिंसिताः (हिरण्यपर्णाः) हिरण्यानि पर्णाः पक्षा येषान्ते (उहुवः) भाराणां वोढारः (उषर्बुधः) उषसि बोधयुक्ताः (उदप्रुतः) उदकस्य गमयितारः (मन्दिनः) आनन्दयितारः (मन्दिनिस्पृशः) आनन्दस्य स्पर्शयितारः (मध्वः) मधुनः (न) इव (मक्षः) मक्षिराजः (सवनानि) ऐश्वर्याणि (गच्छथः) ॥४॥
अन्वय : हे राजसेनेशौ ! वां ये मधुमन्तोऽस्रिधो हिरण्यपर्णा उषर्बुध उहुव उदप्रुतो मन्दिनः मन्दिनिस्पृशो मध्वो मक्षो न हंसासः सन्ति तैः सवनानि युवां गच्छथः ॥४॥
भावार्थ : हे राजपुरुषा ! भवन्तो यानयन्त्रेष्वग्निजलादिसम्प्रयोगात् सद्योगत्वाऽऽगत्यैश्वर्य्यं चिकीर्षेयुस्तर्हि किं रत्नं नोपलभेरन् ॥४॥