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Rigveda / 4 / 46 / 6

इन्द्र॑वायू अ॒यं सु॒तस्तं दे॒वेभिः॑ स॒जोष॑सा। पिब॑तं दा॒शुषो॑ गृ॒हे ॥६॥

Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 46 | Mantra No : 6

In Hindi:

ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्रवायू | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : अब सूर्य्ययुक्त वायु विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥

पदपाठ : इन्द्र॑वायू॒ इति॑। अ॒यम्। सु॒तः। तम्। दे॒वेभिः॑। स॒ऽजोष॑सा। पिब॑तम्। दा॒शुषः॑। गृ॒हे ॥६॥

पदार्थ : हे (सजोषसा) तुल्य प्रीति की कामना करनेवाले (इन्द्रवायू) सूर्य्य और वायु के सदृश अध्यापक और उपदेशको ! जो (अयम्) यह (दाशुषः) दाता जन के (गृहे) गृह में (सुतः) उत्पन्न किया गया (तम्) उसको (देवेभिः) विद्वानों वा श्रेष्ठ पदार्थों के साथ जैसे (पिबतम्) पान करो, वैसे ही सूर्य्य और वायु सब से रस पीते हैं ॥६॥

भावार्थ : इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य्य और पवन सब के उपकार को निरन्तर करते हैं, वैसे ही विद्वानों को करना चाहिये ॥६॥