Rigveda / 4 / 49 / 4
अ॒स्मे इ॑न्द्राबृहस्पती र॒यिं ध॑त्तं शत॒ग्विन॑म्। अश्वा॑वन्तं सह॒स्रिण॑म् ॥४॥
Veda : Rigveda | Mandal : 4 | Sukta : 49 | Mantra No : 4
In English:
Seer : vaamadevo gautamaH | Devta : indraabRRihaspatii | Metre : gaayatrii | Tone : ShaDjaH
Subject : English Translation Under Process
Verse : asme indraabRRihaspatii rayi.m dhatta.m shatagvinam. ashvaavanta.m sahasriNam .4.
Component Words : asme iti. indraabRRihaspatii iti. rayim. dhattam. shata.agvinam. ashva.avantam. sahasriNam .4.
In Hindi:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्राबृहस्पती | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
पदपाठ : अ॒स्मे इति॑। इ॒न्द्राबृ॒ह॒स्प॒ती॒ इति॑। र॒यिम्। ध॒त्तम्। श॒त॒ऽग्विन॑म्। अश्व॑ऽवन्तम्। स॒ह॒स्रिण॑म् ॥४॥
पदार्थ : हे (इन्द्राबृहस्पती) बिजुली और सूर्य्य के सदृश राजा और प्रधान जनो ! आप दोनों (अस्मे) हम लोगों के लिये (शतग्विनम्) असङ्ख्यात गौओं और (अश्वावन्तम्) उत्तम घोड़ों आदि से युक्त (सहस्रिणम्) असंख्य पदार्थ जिसमें विद्यमान उस (रयिम्) धन को (धत्तम्) धारण करो ॥४॥
भावार्थ : तभी राजा और प्रधानादिकों की प्रशंसा होवे कि जब सब प्रजा को धन और विद्या से युक्त करें ॥४॥
In Sanskrit:
ऋषि : वामदेवो गौतमः | देवता : इन्द्राबृहस्पती | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः
विषय : पुनस्तमेव विषयमाह ॥
पदपाठ : अ॒स्मे इति॑। इ॒न्द्राबृ॒ह॒स्प॒ती॒ इति॑। र॒यिम्। ध॒त्तम्। श॒त॒ऽग्विन॑म्। अश्व॑ऽवन्तम्। स॒ह॒स्रिण॑म् ॥४॥
पदार्थ : (अस्मे) अस्मभ्यम्। अत्र शे इति सूत्रेण प्रगृह्यसञ्ज्ञा, प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यमिति सन्ध्यभावः। (इन्द्राबृहस्पती) विद्युत्सूर्य्याविव राजप्रधानौ (रयिम्) धनम् (धत्तम्) (शतग्विनम्) शतग्वोऽसङ्ख्याता गावो विद्यन्ते यस्मिँस्तम् (अश्वावन्तम्) प्रशस्ताऽश्वादिसहितम् (सहस्रिणम्) सहस्रमसङ्ख्याः पदार्था विद्यन्ते यस्मिँस्तम् ॥४॥
अन्वय : हे इन्द्राबृहस्पती ! युवामस्मे शतग्विनमश्वावन्तं सहस्रिणं रयिं धत्तम् ॥४॥
भावार्थ : तदैव राजप्रधानादीनां प्रशंसा जायेत यदा सर्वां प्रजां धनाढ्यां विदुषीं च ते कुर्य्युः ॥४॥